जब रेल पुलिस बैरक परिसर में सजता था मनोरंजन का संसार, झूले से लेकर जादूगर तक खींचते थे लोगों का ध्यान
Chhapra: छपरा में जन्माष्टमी का त्योहार केवल भगवान श्रीकृष्ण की पूजा और मंदिरों में सजने वाली झांकियों तक सीमित नहीं था। शहर के लोगों के लिए यह पर्व अपने साथ उत्सव, उमंग और मनोरंजन की ऐसी यादें लेकर आता था, जिन्हें आज भी पुरानी पीढ़ी याद करती है। इन्हीं यादों में एक खास नाम था आरपीएफ मेला।
- जब रेल पुलिस बैरक परिसर में सजता था मनोरंजन का संसार, झूले से लेकर जादूगर तक खींचते थे लोगों का ध्यान
- हेलिकॉप्टर वाला झूला था खास आकर्षण
- बलून पर निशानेबाजी का अलग रोमांच
- चाट-पानी पूरी और दुकानों की रौनक
- जादूगर और मायानगरी के शो
- बैरक के बीच मंदिर और कृष्ण की झांकी
- अब नहीं लगता आरपीएफ मेला
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रेल पुलिस बैरक परिसर में जन्माष्टमी के अवसर पर प्रत्येक वर्ष लगने वाला यह मेला स्थानीय लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय था। लोग इसे प्यार से आरपीएफ मेला कहते थे। उस समय जब मनोरंजन के साधन सीमित थे, यह मेला बच्चों, युवाओं और परिवारों के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र हुआ करता था। जन्माष्टमी आते ही लोगों को इस मेले का इंतजार रहने लगता था।
शाम होते ही रेल पुलिस बैरक का पूरा इलाका जैसे रोशनी और चहल-पहल से भर जाता था। दूर से ही मेले की रौनक दिखाई देने लगती थी। परिवार के साथ लोग मेला घूमने पहुंचते और बच्चों की खुशी देखते ही बनती थी। उस दौर में किसी बच्चे के लिए मेले में जाना अपने आप में एक बड़ा उत्सव हुआ करता था।
हेलिकॉप्टर वाला झूला था खास आकर्षण
आरपीएफ मेले की सबसे खास यादों में झूले शामिल थे। खासकर हेलिकॉप्टर वाला झूला बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय था। हेलिकॉप्टर की शक्ल में बने झूले में बैठना बच्चों के लिए किसी रोमांच से कम नहीं होता था।
बड़े झूलों के साथ छोटे बच्चों के लिए भी अलग-अलग मनोरंजन के साधन होते थे। कई बच्चे एक ही झूले पर बार-बार बैठने की जिद करते थे और अभिभावक उन्हें समझाते-समझाते थक जाते थे। लेकिन बच्चों की दुनिया में उस समय मेला ही सबसे बड़ा मनोरंजन था।
बलून पर निशानेबाजी का अलग रोमांच
मेले में बलून पर निशानेबाजी भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहती थी। सामने लगे रंग-बिरंगे गुब्बारों पर निशाना साधना बच्चों और युवाओं को खूब पसंद आता था। निशाना सही लगने पर बलून फूटने की आवाज के साथ मिलने वाला छोटा सा इनाम उस खुशी को और बढ़ा देता था।
आज मोबाइल गेम और आधुनिक मनोरंजन के दौर में निशानेबाजी का वह अनुभव शायद सामान्य लगे, लेकिन उस समय मेले में गुब्बारे पर निशाना लगाना अपने आप में रोमांचकारी अनुभव हुआ करता था।
चाट-पानी पूरी और दुकानों की रौनक
मेला केवल झूले और खेल तक सीमित नहीं था। वहां खाने-पीने के ठेले भी खूब सजते थे। चाट, पानी पूरी और तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजनों की खुशबू मेले की पहचान बन जाती थी। बच्चे अपनी पसंद की चीज खाने के लिए जिद करते तो बड़े भी मेले की चाट और पानी पूरी का स्वाद लेने से खुद को रोक नहीं पाते थे।
खाने-पीने के अलावा खिलौनों, गुब्बारों और विभिन्न सामानों की दुकानें भी लगती थीं। रंग-बिरंगे खिलौने और सजावटी सामान बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करते थे। कई लोगों के लिए मेला घूमना और वहां से कोई छोटी सी चीज खरीदकर घर लौटना उस समय की खूबसूरत परंपरा थी।
जादूगर और मायानगरी के शो
आरपीएफ मेले की रौनक को बढ़ाने में जादूगर और मायानगरी जैसे शो भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। जादूगर के करतब देखकर बच्चे ही नहीं, बड़े भी हैरान रह जाते थे। आंखों के सामने होने वाले जादू के खेलों को लोग देर तक देखते रहते।
मायानगरी और अन्य मनोरंजन शो भी लोगों की उत्सुकता बढ़ाते थे। आज के डिजिटल युग में जब मनोरंजन कुछ सेकेंड में मोबाइल की स्क्रीन पर उपलब्ध हो जाता है, उस दौर में किसी जादूगर या मनोरंजन कार्यक्रम को देखने के लिए मेले में जाना ही एक खास अनुभव था।
बैरक के बीच मंदिर और कृष्ण की झांकी
मेले के बीच स्थित मंदिर जन्माष्टमी की धार्मिक आस्था का केंद्र होता था। मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की आकर्षक झांकी बनाई जाती थी। श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करते और झांकी के दर्शन करते थे।
आज भी जन्माष्टमी के अवसर पर वहां झांकी बनाई जाती है, लेकिन उस समय झांकी के साथ मेले का जो वातावरण बनता था, उसकी बात ही अलग थी। धार्मिक आस्था और मनोरंजन एक ही परिसर में मिलकर जन्माष्टमी को पूरे शहर के लिए खास बना देते थे।
अब नहीं लगता आरपीएफ मेला
समय बदला और मनोरंजन के साधन भी बदल गए। टेलीविजन से लेकर इंटरनेट, मोबाइल फोन और डिजिटल माध्यमों तक मनोरंजन के विकल्प लगातार बढ़ते गए। बच्चों के पास आज ऐसे साधन हैं, जिनकी कल्पना उस दौर में करना भी मुश्किल था।
इसी बदलाव के बीच आरपीएफ मेला धीरे-धीरे बीते समय की याद बन गया। आज जन्माष्टमी पर मंदिर में झांकी तो सजती है, श्रद्धालु भी पहुंचते हैं, लेकिन वह मेला नहीं लगता, जिसमें पूरा शहर उमड़ता था।
फिर भी आरपीएफ मेला उन लोगों की स्मृतियों में आज भी जीवित है, जिन्होंने अपने बचपन या युवावस्था में वहां की रौनक देखी है। किसी को हेलिकॉप्टर वाला झूला याद है, किसी को बलून पर निशाना लगाना, किसी को चाट-पानी पूरी का स्वाद तो किसी को जादूगर और मायानगरी का शो।
जनरेशन जेड के इस आधुनिक दौर में मनोरंजन के साधन भले ही बदल गए हों, लेकिन पुरानी पीढ़ी के लिए आरपीएफ मेला केवल एक मेला नहीं था। वह बचपन की खुशी, परिवार के साथ बिताया समय और जन्माष्टमी से जुड़ी ऐसी स्मृति था, जिसकी चमक आज भी धुंधली नहीं हुई है।
शायद इसी वजह से आज भी जब जन्माष्टमी आती है, छपरा के पुराने लोगों की बातचीत में कभी-कभी वह सवाल जरूर लौटता है
क्या आपको याद है जन्माष्टमी पर लगने वाला आरपीएफ मेला?



















