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श्री कामता सखी जी महाराज: जीवन और साहित्य

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लेखक परिचय

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प्रोo (डॉo) अमरनाथ प्रसाद
अंग्रेजी विभागाध्यक्ष, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा, बिहार

SHARDA
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सारण की आध्यात्मिक भूमि ने भारतीय संत परंपरा को अनेक महापुरुष दिए हैं, जिनमें संत कवि लक्ष्मी सखी और उनके परम शिष्य श्री कामता सखी जी महाराज का स्थान अत्यंत गौरवपूर्ण है। दोनों संतों ने न केवल आध्यात्मिक साधना को जीवन का आधार बनाया बल्कि भोजपुरी भाषा में ऐसे ग्रंथों की रचना की जो वेद, उपनिषद और पुराणों के तत्वज्ञान को जनसामान्य तक सरल रूप में पहुँचाते हैं। संत लक्ष्मी सखी मूलतः निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रवर्तक संत हैं। उनकी वाणी में वैदिक दर्शनए उपनिषदों की ब्रह्मविद्या और पुराणों की कथात्मक दृष्टि का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने कर्मकांड जाति भेद और बाह्य आडंबर का विरोध करते हुए नाम.स्मरण, आत्मशुद्धि और सहज भक्ति को मुक्ति का मार्ग बताया। उनकी भाषा भोजपुरी होते हुए भी भाव और अर्थ में अत्यंत गंभीर है। वे प्रतीक और रूपक के माध्यम से ब्रह्म, जीव और माया के संबंध को स्पष्ट करते हैं। उनकी वाणी में गुरु तत्व सर्वोपरि है और साधक को आत्मज्ञान की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक माना गया है।

श्री कामता सखी जी महाराज संत लक्ष्मी सखी के परम शिष्य के रूप में उसी आध्यात्मिक परंपरा के संवाहक हैं। उन्होंने गुरु की वाणी को आत्मसात कर उसे अधिक लोकधर्मी और अनुभूतिपरक रूप दिया। उनकी रचनाओं में भक्ति के साथ.साथ सामाजिक चेतना भी स्पष्ट दिखाई देती है। जहाँ गुरु की वाणी दार्शनिक गहराई लिए हुए है, वहीं शिष्य की वाणी में संवादात्मकता करुणा और लोकजीवन की पीड़ा अधिक मुखर है। उन्होंने साधारण जन को केंद्र में रखकर भक्ति को जीवन की व्यावहारिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया।

Tanishq Chhapra
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आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो संत लक्ष्मी सखी अधिकतर तत्वचिंतन और ब्रह्मज्ञान की ओर उन्मुख हैं, जबकि श्री कामता सखी जी महाराज उस ज्ञान को अनुभव और आचरण में रूपांतरित करते हैं।

लक्ष्मी सखी की भाषा में शास्त्रीय अनुशासन और आध्यात्मिक गंभीरता प्रमुख है वहीं कामता सखी की भाषा में भावात्मक प्रवाह और लोकसंवेदना अधिक प्रबल है। दोनों की रचनाएँ मिलकर एक पूर्ण संत परंपरा का निर्माण करती हैं जहाँ गुरु दर्शन देता है और शिष्य उसे समाज में सजीव बनाता है।

इन दोनों संतों का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने भोजपुरी को केवल लोकभाषा न रहने देकर दार्शनिक अभिव्यक्ति की समर्थ भाषा बना दिया। उनके ग्रंथों में वेद और पुराणों का सार सरल पदों और दोहों में व्यक्त हुआ है जिससे अशिक्षित जन भी आध्यात्मिक सत्य से जुड़ सके।

हर वर्ष पोष पूर्णिमा के पावन अवसर पर इन दोनों संतों के समाधि स्थलों पर भव्य आयोजन होता है। मेले का स्वरूप केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक होता है, जहाँ दूर.दूर से संत, विद्वान और श्रद्धालु एकत्र होते हैं। भजन.कीर्तन, प्रवचन और दर्शन के माध्यम से यह परंपरा आज भी जीवंत है और सारण की आध्यात्मिक चेतना को सुदृढ़ करती है।

श्री कामता सखी जी महाराज सारण के महान संत थे। उनका संबंध भक्ति धारा के सखी संप्रदाय से है। सखी संप्रदाय के प्रवर्तक सारण प्रमंडल के एक महान भोजपुरी संत कवि लक्ष्मी सखी जी महाराज हुए जिन्होंने भोजपुरी में चार महान आध्यात्मिक ग्रंथों की रचना की है अमर सीढ़ी, अमर कहानी, अमर विलास, अमर फ़रास। सखी मत के मानने वाले लोग अपने आराध्य भगवान को पति भाव में पूजा करते हैं। भक्त अपने आपको पत्नी की तरह व्यवहार करता है और भगवान को पति के रूप में मानते हुए ए उनको खुश करने के लिए तथा उनकी सेवा में लगे रहने के लिए वे सारी क्रियाएं करता है जो एक नारी अपने पति के लिए करती है । पति के रूप में भगवान की पूजा करने का यह भक्ति भाव सखी संप्रदाय का महत्वपूर्ण विषय वस्तु है । संत लक्ष्मी सखी जी महाराज का समाधि स्थल गोपालगंज जिले के अंतर्गत राजापट्टी स्टेशन से लगभग 5 किलोमीटर उत्तर पूरब दिशा में टेरूआ नामक ग्राम में अवस्थित है।

श्री लक्ष्मी सखी जी महाराज के शिष्य परंपरा में सबसे महान शिष्य हुए श्री कामता सखी जी महाराज जिनका समाधि स्थल छपरा शहर के प्रभुनाथ नगर में अवस्थित है। इनके पुत्र श्री अविनाशी सखी जी भी एक महान संत हुए जिनका समाधि स्थल कामता सखी जी के समाधि स्थल के बगल में है। यहां कामता सखी जी महाराज द्वारा बनाया हुआ एक प्राचीन तपो स्थल अभी भी है जिसको देखा जा सकता है ।इसकी देखरेख उनके परपौत्र श्री कृष्ण मुरारी सखी और श्री बृजमोहन वर्मा जी करते हैं ।कल मेरी मुलाकात उनके साथ हुई और उन्होंने बाबा के बारे में बहुत से अनछु, प्रसंगों को बतलाया । प्रभुनाथ नगर मोहल्ला में रहने वाले भूतपूर्व आर डी डी ई श्री ब्रजेंद्र कुमार सिन्हा जी भी कल मेरे साथ समाधी स्थल पर गए थे और उन्होंने भी बाबा के जीवन से संबंधित बहुत सी बातों को बतलाया।

टेरूआं ग्राम निवासी डॉ ललन पांडेए सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक ने संत कवि लक्ष्मी सखी पर अपना शोध प्रबंध का कार्य किया है। उस शोध प्रबंध में डॉ ललन पांडे जी ने कमाता सखी जी की भी चर्चा की है। शोध ग्रंथ के अनुसार कामता सखी जी का सबसे बड़ा योगदान यह है उन्होंने लक्ष्मी सखी जी द्वारा रचित चारों धार्मिक ग्रंथ अर्थात अमर सीढ़ी, अमर कहानी, अमर विलास और अमर फरास, को जो कैथी लिपि में लिखी गई थी उसको उन्होंने संग्रहित कियाए पुस्तक का आकार दिया, छपवाने का काम किया और इसके लिए उन्होंने एक प्रेस भी खोला जो छपरा का बहुत पुराना प्रेस था जिसका नाम था श्री कामता प्रेस। इस प्रेस के द्वारा उन्होंने अपने गुरु द्वारा रचित तमाम धर्म ग्रंथों को प्रकाशित किया और उसे जन.जन तक पहुंचाने का काम किया, खासकर इन धर्म ग्रंथों में लोक धुनों पर आधारित सांझा, बारहमासा एककहरा, देवी स्तुति, मंगल गारी इत्यादि का अलग से प्रकाशन छोटे.छोटे पुस्तक के रूप में करके जन.जन तक पहुंचाने में बहुत बड़ा सहयोग किया। इनका अथक प्रयास ठीक वैसे ही था जैसे स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस के उपदेशों को न केवल देश में बल्कि विश्व के कोने कोने में ले जाने का काम किया। जन श्रुतियों के अनुसार कामता सखी जी महाराज एक सिद्ध संत थे। उनकी वाणी अमिट थी। आज भी उनके भक्त लोग प्रभुनाथ नगर स्थित उनके समाधि स्थल पर दूर.दूर से आते हैं। मत्था टेक कर उनका आशीर्वाद लेते हैं।

संत कामता सखी जी के पुत्र श्री अविनाशी सखी जी के बारे में कहा जाता है कि उनका जन्म भी संत कवि लक्ष्मी सखी जी के आशीर्वाद से ही हुआ था। अतः वह भी एक महान संत हुए। उन्होंने अपने पिता संत कामता सखी जी महाराज के बारे में संक्षिप्त परिचय काव्य के माध्यम से लिखा है जिसमें यह बतलाया गया है की संत कामता सखी जी महाराज साधु होने के पहले एक कुशल शिक्षक थे । वे फारसी, अंग्रेजी और हिन्दी के विद्वान थे । वे छपरा के कॉलेजिएट स्कूल में पढाते थे। साधु होने की घटना को कामता सखी जी महाराज के परपौत्र श्री बृजमोहन वर्मा जी ने बतलाया की एक दिन की घटना है की वे स्कूल नहीं जा पाए, क्योंकि वे भगवान के पूजा पाठ में इतना ध्यानस्त हो गए थे की विद्यालय जाना ही भूल गए। संजोग से उस दिन विद्यालय में अचानक इंस्पेक्शन हो गया। अंग्रेज का जमाना था। एक अंग्रेज पदाधिकारी जो स्कूल इंस्पेक्टर था, वही स्कूल में इंस्पेक्शन के लिए आया था। जब इंस्पेक्शन खत्म हो गया तब कामता वर्मा दौड़े.दौड़े स्कूल पहुंचे और देर से आने की क्षमा याचना की। इस पर हेडमास्टर साहब ने कहा कि आप तो क्लास में पढ़ा रहे थे और आपने अलजेब्रा बोर्ड पर बनाया भी है और आपने उपस्थिति पंजी में अपना सिग्नेचर भी किया है। इतना सुनते ही कामता सखी जी को आभास हो गया कि सिग्नेचर करने वाला और क्लास में कक्षा लेने वाला कोई दूसरा नहीं, बल्कि उनके आराध्य भगवान स्वयं आए थे। इसी बात पर शनिवार के दिन उसी जगह अपने कोट पैंट और टाई को उन्होंने उतार कर फेंक दिया और नंगे वहां से भागते हुए सुनसान जगह पर तपस्या करने लगे। वह सुनसान जगह कोई और नहीं बल्कि आज का प्रभूनाथ नगर था। वहां राम सुंदर सिंह जो दहियावां के एक संत प्रेमी थे उन्हीं का बगीचा था। उन्हीं के बगीचे में सुनसान जगह पर उन्होंने अपनी कुटिया बनाई और वहीं पर रहने लगे और तपस्या करने लगे और फिर साधु बन गए। कालांतर में जब उन्होंने संत लक्ष्मी सखी जी महाराज से मुलाकात की तो उनके हृदय में एकाएक परिवर्तन हुआ और वे उनके एक महान शिष्य बन गए।

जब मैं जगदम कॉलेज में विद्यार्थी था तो मैं वही कामता सखी आश्रम के बगल में कामता हॉस्टल में एक मित्र के कमरे में कुछ दिनों तक रहा था। आज न तो वो कामता हॉस्टल है और ना ही वह वीरान ए शहर के कोलाहल से दूर जगहए बल्कि पूरा इलाका कॉलोनी में तब्दील हो गया है । कामता सखी जी के सुपुत्र श्री अविनाशी सखी जी को मैंने देखा था।मैंने उनसे बातें भी की थी और उनका आशीर्वाद लिया था। यह घटना 1984 की है। बाद में 1990 में संत अविनाशी जी ईश्वर के प्यारे हो गए और इस धरा धाम को छोड़कर स्वर्ग लोक सुधार गए।

संत अभिनाशी सखी जी महाराज ने अपने पूज्य पिता संत कामता सखी जी के बारे में एक संक्षिप्त जीवनी एक पद के माध्यम से लिखा है जिसमें उन्होंने कमता सखी महाराज के जीवन का एक बहुत सुंदर वर्णन किया है जो निम्नलिखित है-

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प्रभु तुम दिन बंधु भगवान।
मूल चंद्र दास के मूल सोरंहिया, सिकटिया संतान।
उसी संतान में हुए श्री कामता सखी भगवान ।
कायस्थ कुल में जन्म लियो, सिकटिया जन्म स्थान।
थाना बसंतपुर जिला सारण में, जो है प्रधान।
पिता का नाम मुंशी महेंद्र लाल, जो थे एक महान ।
माता का नाम रामकली देवी, जिससे हुए श्री कामता भगवान।
अंग्रेजी, हिंदी, फारसी के, हुए बड़े विद्वान।
बाल पढ़ाए कॉलेजिएट में, छपरा के दरमियान।
कुछ दिन बाद इनको हुआ आत्मज्ञान। छोरी कॉलेजिएट उत्तर भागे, छपरा के मैदान।
राम सुंदर सिंह टोला दहियावां, के थे चतुर सुजान।
वहीं बैठा, बाबा को, अपने बगीचे आन ।
सतगुरु हिंदी शब्द की कुंजी, खुल गया गगन पेहान।
लंगड़ा, लूलाए भूखाए दुखा पाते ठवर ठेकान।
कहे अविनाशी श्री कामता सखी के बालक ईश्वर तुल्य इन्हें जान ।
बिना इनके दरस परस के होत नहीं कल्याण।
प्रभु तुम दिन बंधु भगवान

श्री कामता सखी जी महाराज ने अपनी वाणी को दोहावली नामक ग्रंथ में व्यक्त किया है जो ज्ञान और अध्यात्म से भरपूर है। दोहावली का प्रत्येक पद गागर में सागर भरने जैसा है। उसके कुछ पद निवेदित कर रहा हूंरू

कामता सखी इस जगत में, दुई वस्तु है सार।
परमारथ ओ हरीभजन, निश्चय लेहु विचार।

कामता सखिया याद रख, दो बातन को हमार ।
एक तो अपने मौत को, दूजे श्री करतार।

संत कोई बिरला होत है, संत भय तुलसी कबीर।
संत भय लक्ष्मी सखी, कामता सखी के पीर।

चलिए मिलन को संत से, जहां तीर्थन के समूह।
दर्शन से अघजात है, पवित्र होत है रूह।

श्री कविता सखी जी महाराज का जीवन दर्शन अध्यात्म और काव्य उनके गुरु श्री श्री 108 महात्मा संत शिरोमणि संत कबीर लक्ष्मी सखी जी महाराज से प्रभावित है संत लक्ष्मी सखी जी सारण के एक महान संत हुए जिन्होंने भोजपुरी साहित्य में 4 महान ग्रंथों की रचना की है जो भोजपुरी भाषी लोगों के लिए अतुलनीय अनुपम हैं। वे चार नित्य वंदनीय ग्रंथ जिन्हें ग्रंथ रामजी कहते हैं निम्नलिखित है- अमर सीढ़ी, अमर कहानी, अमरविलास, अमर फ़रास

सखी संप्रदाय में उपरोक्त चारों ग्रंथों की प्रतिदिन सुबह शाम आरती और पूजा होती है । यहसाधारण पुस्तक नहीं एबल्कि ग्रंथ है जिनमें ईश्वर की वाणी है। उपरोक्त चारों ग्रंथों के सारे पद किसी न किसी राग पर आधारित है। संत कवि लक्ष्मी सखी जी महाराज की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने भोजपुरी के जितने भी प्रचलित प्रसिद्ध राग हैं एउन सभी रागों पर काफी लयात्मक ढंग से और अध्यात्मिक भाव से अपने पदों की रचना की है जो कला के धागे में बुनकर व्यक्त किया गया है। इन्हीं चारों ग्रंथों को सर्वप्रथम कमता सखी जी महाराज ने प्रकाशित करवाया और इसके लिए उन्होंने एक विशेष प्रेस खोल दिया जो कामता सखी प्रेस के नाम से प्रसिद्ध है और जो छपरा के सलेमपुर में अवस्थित है।

लक्ष्मी सखी विरचित दूसरी पुस्तक का नाम अमर कहानी है जो वास्तव में अमर है ।यदि इसमें लिखित सभी पदों को पढ़ कर समझ लिया जाए और अपने जीवन में पालन किया जाए तो शारीरिक रूप से तो नहीं परंतु मानसिक रूप से आदमी अवश्य अमर बन जाएगा । इस पुस्तक के भी सारे पद संगीत के किसी न किसी राग पर आधारित है। इसमें जो सबसे प्रसिद्ध राग है, वह है, विनय विहाग, राग गारी, झुमरा, हुमरा, बाल लीला, ठुमरी, भैरवी, लवणी, पूर्वी, खरा लए, खेमटा, सवैय, निर्गुण, ध्रुपद एकजली एककहरा एहोरी और चैता।
निम्नलिखित पद विनय विहाग पर आधारित हैरू

यह हमारे प्रभु हरण शकल भवत्रासा
कबहू एको फलक जनू बिसरो रहे जब लेक सवासां
काहे दु आज उगत नहीं चंदा चातक मरत पियासा
बहुतेक धावत केहू केहू पावत तेजी मेजी सकल दुरासा
केहू केहू पावत निजु घर बासा निगूरा जात निराशा
जे हरख मगन में कुकुर जइसन चाखत हाड़ वो मासा
चलू सखी अगते से होखहू दासा नाही त परे के परी फाँसा।
अबकी जमहू से जीती लेहु पासा, चलू बस गगन अकाशा।
लक्षमी सखिया छूटेला सोवाँसा, अचरज मति करु आसा।
नाहित नाहक होखेला बिनासा सुंदर मानुस तन खासा।; अमर कहानी

एक पद सतगुरु वंदना में श्री अविनाशी सखी जी महाराज ने कामता सखी जी महाराज के बारे में लिखा है-

हे भेष दिगंबर धारीए तुमको बार.बार नमस्कार ।
हे प्रभु तुम्हारी गति अति न्यारी एबड़े.बड़े पतितों को तारी।
हमको काहे दूं जान बिसारी, करो अब मती देरी।
इंहा रावण उहां कंश पछोरी, प्रहलाद के बिपती हरोरी।
द्रोपद सुता के लाज रखोरी, लाओ अब मति देरी।
चरण छुवाई अहिल्या तारी, गणिका गिद्ध अजामिल तारी।
गज को ग्राह जब किया लाचारी, तुरंत किया सहारी।
जब जब भूमि पर होत पुकारी, तब तब प्रभु लेत अवतारी।
यहीं प्रभु सिकटिया अवतारी, श्री महेंद्र गृह किया उजियारी।
श्री लक्ष्मी सखी जी ग्रंथ उचारी, श्री कामता सखी जी उसे प्रचारी।
सखी मठ की नीव डारी, बहुत किया उपकारी
कहे अविनाशी श्री कमता सखी के बालक, प्रभु लीला है अद्भुत भारी ।
जो नर इन्हें करत पुकारी, होत है भव से पारी।
हे भेष दिगंबर धारीए तुमको बार.बार नमस्कार३

संत लक्ष्मी सखी और श्री कामता सखी जी महाराज गुरु.शिष्य परंपरा के ऐसे उदाहरण हैं जहाँ ज्ञान और अनुभवए दर्शन और व्यवहार, शास्त्र और लोक एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं। भोजपुरी साहित्य और संत परंपरा में इन दोनों का स्थान स्थायी है और उनकी वाणी आज भी आध्यात्मिक पथिकों के लिए प्रकाशस्तंभ बनी हुई है।

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