People offering Namaz on the occasion of Id-Ul-Zuha, at Jama Masjid, in New Delhi on August 12, 2019.
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सुपौल, 27 फ़रवरी (हि.स.)। रमज़ान उल मुबारक के दूसरे जुमा की नमाज़ शहर एवं आसपास के गांवों में पूरे अकीदत और एहतराम के साथ अदा की गई। सुबह से ही मस्जिदों में नमाज़ियों की भीड़ उमड़ पड़ी। लोगों ने वुज़ू कर पाक-साफ कपड़े पहने और अल्लाह की इबादत के लिए बड़ी संख्या में मस्जिदों का रुख किया। कई मस्जिदों के बाहर भी नमाज़ियों की लंबी कतारें देखने को मिलीं। इमामों ने अपने ख़ुत्बे में रमज़ान के दूसरे अशरे, जिसे मग़फ़िरत (गुनाहों की माफी) का अशरा कहा जाता है, की अहमियत बयान की। उन्होंने कहा कि रमज़ान सब्र, रहमत और आत्मशुद्धि का महीना है। रोज़ा इंसान को परहेज़गार बनाता है और समाज में भाईचारे, हमदर्दी व आपसी मोहब्बत को बढ़ावा देता है। वैभव सूर्यवंशी बने भारतीय टीम के लिए चुने जाने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी इस मौके पर मौलाना मो. अबुल महासिन ने कहा कि रमज़ान इस्लामी साल का सबसे पवित्र और बरकतों भरा महीना है। इस मुक़द्दस महीने में अल्लाह तआला अपने बंदों पर खास रहमतें नाज़िल करता है, नेकी का सवाब कई गुना बढ़ा देता है और गुनाहों की माफी के दरवाजे खोल देता है। उन्होंने बताया कि रमज़ान को तीन अशरों में तकसीम किया गया है—पहला रहमत का, दूसरा मग़फ़िरत का और तीसरा जहन्नम से निजात का। उलेमाओं ने कहा कि दूसरे अशरे में तौबा और इस्तिग़फ़ार की खास अहमियत है। तौबा केवल ज़बानी इज़हार नहीं, बल्कि दिल से सच्चा पछतावा और आगे गुनाह न करने का पक्का इरादा है। अल्लाह तआला “ग़फ़ूर” और “ग़फ़्फ़ार” है, जो सच्चे दिल से तौबा करने वालों को माफ़ कर देता है। आयरलैंड और इंग्लैंड के खिलाफ टी-20 शृंखला के लिए भारतीय टीम घोषित, श्रेयस अय्यर बने कप्तान ख़ुत्बे में इस बात पर भी जोर दिया गया कि रमज़ान का हर दिन इबादत के लिए अहम है, लेकिन मग़फ़िरत के अशरे में इबादत में इख़लास और बढ़ोतरी जरूरी है। पाँच वक्त की नमाज़ की पाबंदी, तरावीह का एहतिमाम, कुरआन की तिलावत, ज़िक्र-ओ-अज़कार और दरूद शरीफ़ की कसरत गुनाहों की माफी का जरिया बनते हैं। रोज़ा केवल भूख-प्यास का नाम नहीं, बल्कि आंख, कान और ज़बान को भी बुराइयों से बचाना असल मकसद है। उलेमाओं ने युवाओं से अपील की कि वे कुरआन करीम को समझने और उस पर अमल करने की ओर ध्यान दें। कुरआन मुकम्मल ज़िंदगी का दस्तूर है, जो इंसाफ, ईमानदारी और इंसानी बराबरी का पैग़ाम देता है। साथ ही रमज़ान गरीबों, यतीमों और जरूरतमंदों की मदद का भी महीना है। सदक़ा, ज़कात और फितरा के जरिए समाज में बराबरी और भाईचारे को बढ़ावा मिलता है। अंडर-18 एशिया कप : जापान को 4-1 से हराकर भारतीय पुरुष हॉकी टीम बनी चैंपियन अंत में देश-दुनिया में अमन-चैन और खुशहाली के लिए खास दुआ की गई कि अल्लाह तआला हम सबको रमज़ान के दूसरे अशरे की बरकतों से भरपूर फायदा उठाने और अपनी मग़फ़िरत हासिल करने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।
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सुपौल, 27 फ़रवरी (हि.स.)। रमज़ान उल मुबारक के दूसरे जुमा की नमाज़ शहर एवं आसपास के गांवों में पूरे अकीदत और एहतराम के साथ अदा की गई। सुबह से ही मस्जिदों में नमाज़ियों की भीड़ उमड़ पड़ी। लोगों ने वुज़ू कर पाक-साफ कपड़े पहने और अल्लाह की इबादत के लिए बड़ी संख्या में मस्जिदों का रुख किया। कई मस्जिदों के बाहर भी नमाज़ियों की लंबी कतारें देखने को मिलीं।
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इमामों ने अपने ख़ुत्बे में रमज़ान के दूसरे अशरे, जिसे मग़फ़िरत (गुनाहों की माफी) का अशरा कहा जाता है, की अहमियत बयान की। उन्होंने कहा कि रमज़ान सब्र, रहमत और आत्मशुद्धि का महीना है। रोज़ा इंसान को परहेज़गार बनाता है और समाज में भाईचारे, हमदर्दी व आपसी मोहब्बत को बढ़ावा देता है।
इस मौके पर मौलाना मो. अबुल महासिन ने कहा कि रमज़ान इस्लामी साल का सबसे पवित्र और बरकतों भरा महीना है। इस मुक़द्दस महीने में अल्लाह तआला अपने बंदों पर खास रहमतें नाज़िल करता है, नेकी का सवाब कई गुना बढ़ा देता है और गुनाहों की माफी के दरवाजे खोल देता है। उन्होंने बताया कि रमज़ान को तीन अशरों में तकसीम किया गया है—पहला रहमत का, दूसरा मग़फ़िरत का और तीसरा जहन्नम से निजात का।
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उलेमाओं ने कहा कि दूसरे अशरे में तौबा और इस्तिग़फ़ार की खास अहमियत है। तौबा केवल ज़बानी इज़हार नहीं, बल्कि दिल से सच्चा पछतावा और आगे गुनाह न करने का पक्का इरादा है। अल्लाह तआला “ग़फ़ूर” और “ग़फ़्फ़ार” है, जो सच्चे दिल से तौबा करने वालों को माफ़ कर देता है।
ख़ुत्बे में इस बात पर भी जोर दिया गया कि रमज़ान का हर दिन इबादत के लिए अहम है, लेकिन मग़फ़िरत के अशरे में इबादत में इख़लास और बढ़ोतरी जरूरी है। पाँच वक्त की नमाज़ की पाबंदी, तरावीह का एहतिमाम, कुरआन की तिलावत, ज़िक्र-ओ-अज़कार और दरूद शरीफ़ की कसरत गुनाहों की माफी का जरिया बनते हैं। रोज़ा केवल भूख-प्यास का नाम नहीं, बल्कि आंख, कान और ज़बान को भी बुराइयों से बचाना असल मकसद है।
उलेमाओं ने युवाओं से अपील की कि वे कुरआन करीम को समझने और उस पर अमल करने की ओर ध्यान दें। कुरआन मुकम्मल ज़िंदगी का दस्तूर है, जो इंसाफ, ईमानदारी और इंसानी बराबरी का पैग़ाम देता है। साथ ही रमज़ान गरीबों, यतीमों और जरूरतमंदों की मदद का भी महीना है। सदक़ा, ज़कात और फितरा के जरिए समाज में बराबरी और भाईचारे को बढ़ावा मिलता है।
अंत में देश-दुनिया में अमन-चैन और खुशहाली के लिए खास दुआ की गई कि अल्लाह तआला हम सबको रमज़ान के दूसरे अशरे की बरकतों से भरपूर फायदा उठाने और अपनी मग़फ़िरत हासिल करने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।
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