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22 Nov 2017      

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Chhapra: सूबे की शैक्षणिक व्यवस्था दिन प्रतिदिन बदहाल होती जा रही है. ऐसा कहने में हम परहेज़ नही कर सकते. राज्य सरकार द्वारा शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए लाख दावे और प्रयास के बावजूद भी यहां सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले छात्र एवं छात्राओं के उज्जवल भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती है.

सरकार द्वारा भले ही सूबे में शैक्षणिक गतिविधि को सुदृढ़ करने के लिए निर्देश दिए जाते हैं लेकिन शैक्षणिक व्यवस्था के लिए जरूरी उसके इंफ्रास्ट्रक्चर एवं मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया जाता.

सूबे के विद्यालयों में शैक्षणिक सत्र 17-18 की समाप्ति में लगभग 4 महीने शेष बचे हैं. लेकिन यह छात्रों का दुर्भाग्य है कि उन्हें अब तक सरकार द्वारा दी जाने वाली निशुल्क पुस्तकें नहीं मिली.जिससे कि वह अध्ययन कर सकें.

सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे आखिर अपनी पढ़ाई किस तरह करें यह ना ही उनके अभिभावको पता है, ना ही शिक्षकों को और ना ही शिक्षा विभाग के पदाधिकारियों को.

सरकार ने शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए शिक्षा दिवस पर बड़े बड़े भाषण दिए शिक्षकों से बेहतर शिक्षण की अपील की जिससे एक बेहतर बिहार का निर्माण किया जा सके. लेकिन सरकार के द्वारा कभी छात्रों के सुविधाओं की बात नहीं की गई.

सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे अपनी यानी विभागीय सिलेबस के अनुसार पढ़ते है.उन्हें जो सिलेबस पढ़ाया जाता है उसकी पुस्तकें बाजारों में उपलब्ध नहीं होती. छात्र, अभिभावक, शिक्षक आखिर पुस्तक कहां से लाएं यह किसी को पता नहीं है.

छात्रों के भविष्य से विगत 8 महीने से हो रहे इस खिलवाड़ का हर्जाना छात्र अपने उज्जवल भविष्य से चुका रहें है.

सबसे अचरज की बात तो यह है कि शिक्षा विभाग द्वारा छात्रों की शैक्षणिक गुणवत्ता की जांच को लेकर अर्धवार्षिक परीक्षा भी आयोजित कर दी गयी. उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन भी विभाग द्वारा निर्धारित तिथि के अंदर हो गया और बिना पुस्तकों को पढ़े छात्र इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए.

सूबे की इस शैक्षणिक व्यवस्था पर बिहार का भविष्य कैसा होगा यह हम खुद ही अंदाजा लगा सकते है.

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