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20 Jul 2018      

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सोशल मीडिया फेसबुक पर यह देख कर अच्छा लगा कि कुछ युवा लोग लुप्तप्राय कैथी लिपि को पुनः इसे जीवित करना चाहते हैं और अपनी ओर से प्रयास भी कर रहे हैं. निःसंदेह यह दुःख की बात है कि वह लिपि जिसने कभी फारसी लिपि की जगह लेकर सरकारी कागजातों और कामों में जगह बना ली थी और जो छापाखाना की भी लिपि हो चुकी थी वह आज अपनी पहचान को तरस रही है.

आज सभी जगह पुराने कागजों को पढ़ पाने वाले दीये लेकर ढूंढे जा रहे हैं. यह ऐतिहासिक सत्य है कि मुस्लिम और मुगलों के शासनकाल से ही कायस्थ जाति के लोग ही लिखा पढी करते थे और उन्होंने फारसी लिपि की जगह एक अपनी लिपि गढ़ ली और चूंकि यह लिपि कायस्थों ने गढ़ी इसलिए ‘कैथी’ कहलाई और उसी नाम से चलती आ रही है.

मैं इसे इस लिपि का सबसे बड़ा दुर्भाग्य मानता हूं कि औरों की कौन कहे खुद कायस्थ भी इस लिपि से दूर हो चले हैं. जैसे उर्दू भाषा को जन्म देने वाले सेना के लोगों ने फारसी के अक्षरों का ही इस्तेमाल किया वैसे ही कैथी बनाने वालों ने भी देवनागरी के अक्षरों का ही प्रयोग किया. थोड़ा स्वरूप बदल कर और चूंकि दैनिक बोलचाल की भाषा में बहुत से अक्षरों से बोले जाने शब्द अमतौर से नहीं बोले जाते, कैथी में कई अक्षर नहीं बनाए गए. ना संयुक्त अक्षर बनाए गए, ना अनुस्वार या विसर्ग या हल्लंत. ङ नही बना, श स ष के लिए केवल श ही रहा, इस प्रकार दोनों दीर्घ ही रहा और ऊकार भी केवल हरस्व रहा. कुछ अक्षर जैसे त, र, फ और झ बिल्कुल नये रूप में बनाए गए जो देवनागरी से बिल्कुल नहीं मिलते. कैथी में पूर्ण विराम भी नहीं होता.

हमारे देश में कइ लिपियां विलुप्त हो गयीं क्योंकि उनके छापे नहीं बने. लेकिन कैथी तो अंग्रेजों के जमाने में छापेखानों की भी लिपि हो चुकी थी फिर भी इसे आजादी के बाद से लगातार विलुप्त किया जाता रहा और वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि देवनागरी पढना आसान है और कैथी के लिखने पढने वाले उठते गये.

अब तो आलम यह है कि हिंदी अंग्रेजी के नये शब्द बनाए जा रहे हैँ उनके संक्षिप्त स्वरूप देकर और कंम्प्यूटर की एक अपनी अलग ही लिपि है. ऐसे हालात में कैथी को वापस लाना मुझे तो उतना ही कठिन लग रहा है जितना पाकिस्तान के हडपे गए काश्मीर के हिस्से को वापस लाना. फिर भी जवानों के हौसले पर मुझे पूरा भरोसा है. अगर यह प्रयास ईमानदारी से और एक जन आंदोलन के रूप में चले और साथ ही इसमें किसी राजनीतिबाजों की एंट्री न हो तो, जरूर कैथी अपनी खोई गरिमा पा सकेगी.

लेखक

प्रो० कुमार वीरेश्वर सिन्हा

राजेंद्र कॉलेज छपरा के अंग्रेजी विभाग के पूर्व प्राध्यापक है.

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