पटना, 16 नवम्बर (हि.स.)। बिहार की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मौजूदगी किसी एक चुनावी उछाल की कहानी नहीं, बल्कि चार दशकों में जमीन से उठकर सत्ता की मुख्य धुरी बनने तक का सफर है। 2025 के विधानसभा चुनाव में मिली अभूतपूर्व सफलता ने यह साफ कर दिया है कि बिहार में भाजपा की पैठ अब स्थायी, संगठित और जनभावनाओं से गहराई तक जुड़ी हुई है। बिहार की राजनीति में भाजपा की उपस्थिति चार दशकों के संघर्ष, संगठन और वैचारिक प्रतिबद्धता की कहानी है। भाजपा अब बिहार की राजनीति में न केवल एक प्रमुख पार्टी है, बल्कि स्थिर सत्ता और जनविश्वास की एक केंद्रीय शक्ति भी है। संघर्ष से सत्ता की निर्णायक धुरी बनने तक का सफर आज का पंचांग | शुद्ध ज्येष्ठ शुक्लपक्ष दशमी बिहार में भाजपा की जड़ें 1980 के दशक की शुरुआत में लगनी शुरू हुई थीं, जब पार्टी का आधार जातीय समीकरणों से परे वैचारिक राजनीति और संगठनात्मक ढांचे पर खड़ा किया गया। उस दौर में भाजपा राज्य की राजनीति में हाशिए पर थी। कुछ सीटें, सीमित प्रभाव और बेहद कम संगठनात्मक ताकत, लेकिन 1990 का दशक आते-आते भाजपा ने जनसंघ की विरासत, राम आंदोलन की लहर और बदलती सामाजिक चेतना को साथ मिलाकर अपना आधार मजबूत करना शुरू किया। बिहार में राजग सरकार का सफर लखनऊ कोचिंग आग हादसे में पुलिस ने चार को किया गिरफ्तार, चार अफसर सस्पेंड राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र ने बताया कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में 2005 में पहली बार राजग की सरकार बनी। भाजपा इस सरकार की मुख्य सहयोगी पार्टी थी। 2005 और 2010 दोनों चुनावों में गठबंधन ने भारी बहुमत प्राप्त किया और बिहार में विकास व सुशासन का नया अध्याय शुरू हुआ। 2013 में नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़ा, लेकिन यह ब्रेकअप ज्यादा लंबा नहीं चला। 2017 में नीतीश कुमार ने महागठबंधन छोड़कर फिर से भाजपा के साथ सरकार बनाई। यह वो दौर था जब भाजपा बिहार में अपने सबसे मजबूत रूप में दिखाई दी और 2020 में 74 सीटें जीतकर राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बन गई। 2022 में नीतीश कुमार ने एक बार फिर पलटी मारी और भाजपा विपक्ष में चली गई। मगर इस दौरान भाजपा का बूथ स्तर संगठन पहले से ज्यादा सक्रिय और जन-आधार और मजबूत होता गया। 2025 के चुनाव में भाजपा (राजग) प्रचंड जनादेश के साथ सरकार बनाने जा रही है। यह पहला मौका है जब बिहार में भाजपा न सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, बल्कि सत्ता की धुरी भी बनी। बिहार में भाजपा की पैठ, कैसे बनी इतनी मजबूत? कतर फैक्टरी दुर्घटना में 12 भारतीय नागरिकों की जान गई, दूतावास ने जताया शोक बिहार की राजनीतिक संस्कृति में भाजपा की जड़ें इसलिए गहरी हुईं, क्योंकि पार्टी ने विचार, संगठन और विकास को एक साथ लेकर चलने की रणनीति अपनाई। इसके साथ ही राष्ट्रीय नेतृत्व में भरोसा, पिछड़ों-अति पिछड़ों में बढ़ती स्वीकृति, महिला मतदाताओं में गहरी पैठ, युवाओं में राष्ट्रवाद और रोजगार की अपील, जाति से ऊपर उठता विकास आधारित समर्थन, हर बूथ पर मजबूत संरचना ने पार्टी को मजबूती प्रदान की। भाजपा ने दिखा दिया कि जब संगठन जमीन पर चलता है और नेतृत्व जनता से सीधा संवाद रखता है, तो जनता इतिहास लिखती है। भाजपा अब बिहार की राजनीति की केंद्रीय शक्ति राजनीतिक विश्लेषक चन्द्रमा तिवारी ने कहा कि 2025 के जनादेश के बाद यह स्पष्ट है कि बिहार में भाजपा-राजग का शासन अब किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि जनविश्वास का स्थायी मॉडल बन चुका है। बिहार ने एक बार फिर तय कर दिया कि यहां सत्ता की दहलीज वही पार करता है, जो जनता के दिल, राज्य की जमीन और वहां की संस्कृति से जुड़ा होता है।
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पटना, 16 नवम्बर (हि.स.)। बिहार की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मौजूदगी किसी एक चुनावी उछाल की कहानी नहीं, बल्कि चार दशकों में जमीन से उठकर सत्ता की मुख्य धुरी बनने तक का सफर है। 2025 के विधानसभा चुनाव में मिली अभूतपूर्व सफलता ने यह साफ कर दिया है कि बिहार में भाजपा की पैठ अब स्थायी, संगठित और जनभावनाओं से गहराई तक जुड़ी हुई है।
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बिहार की राजनीति में भाजपा की उपस्थिति चार दशकों के संघर्ष, संगठन और वैचारिक प्रतिबद्धता की कहानी है। भाजपा अब बिहार की राजनीति में न केवल एक प्रमुख पार्टी है, बल्कि स्थिर सत्ता और जनविश्वास की एक केंद्रीय शक्ति भी है।
बिहार में भाजपा की जड़ें 1980 के दशक की शुरुआत में लगनी शुरू हुई थीं, जब पार्टी का आधार जातीय समीकरणों से परे वैचारिक राजनीति और संगठनात्मक ढांचे पर खड़ा किया गया। उस दौर में भाजपा राज्य की राजनीति में हाशिए पर थी। कुछ सीटें, सीमित प्रभाव और बेहद कम संगठनात्मक ताकत, लेकिन 1990 का दशक आते-आते भाजपा ने जनसंघ की विरासत, राम आंदोलन की लहर और बदलती सामाजिक चेतना को साथ मिलाकर अपना आधार मजबूत करना शुरू किया।
राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र ने बताया कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में 2005 में पहली बार राजग की सरकार बनी। भाजपा इस सरकार की मुख्य सहयोगी पार्टी थी। 2005 और 2010 दोनों चुनावों में गठबंधन ने भारी बहुमत प्राप्त किया और बिहार में विकास व सुशासन का नया अध्याय शुरू हुआ। 2013 में नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़ा, लेकिन यह ब्रेकअप ज्यादा लंबा नहीं चला। 2017 में नीतीश कुमार ने महागठबंधन छोड़कर फिर से भाजपा के साथ सरकार बनाई। यह वो दौर था जब भाजपा बिहार में अपने सबसे मजबूत रूप में दिखाई दी और 2020 में 74 सीटें जीतकर राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बन गई। 2022 में नीतीश कुमार ने एक बार फिर पलटी मारी और भाजपा विपक्ष में चली गई। मगर इस दौरान भाजपा का बूथ स्तर संगठन पहले से ज्यादा सक्रिय और जन-आधार और मजबूत होता गया। 2025 के चुनाव में भाजपा (राजग) प्रचंड जनादेश के साथ सरकार बनाने जा रही है। यह पहला मौका है जब बिहार में भाजपा न सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, बल्कि सत्ता की धुरी भी बनी।
बिहार की राजनीतिक संस्कृति में भाजपा की जड़ें इसलिए गहरी हुईं, क्योंकि पार्टी ने विचार, संगठन और विकास को एक साथ लेकर चलने की रणनीति अपनाई। इसके साथ ही राष्ट्रीय नेतृत्व में भरोसा, पिछड़ों-अति पिछड़ों में बढ़ती स्वीकृति, महिला मतदाताओं में गहरी पैठ, युवाओं में राष्ट्रवाद और रोजगार की अपील, जाति से ऊपर उठता विकास आधारित समर्थन, हर बूथ पर मजबूत संरचना ने पार्टी को मजबूती प्रदान की। भाजपा ने दिखा दिया कि जब संगठन जमीन पर चलता है और नेतृत्व जनता से सीधा संवाद रखता है, तो जनता इतिहास लिखती है।
भाजपा अब बिहार की राजनीति की केंद्रीय शक्ति
राजनीतिक विश्लेषक चन्द्रमा तिवारी ने कहा कि 2025 के जनादेश के बाद यह स्पष्ट है कि बिहार में भाजपा-राजग का शासन अब किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि जनविश्वास का स्थायी मॉडल बन चुका है। बिहार ने एक बार फिर तय कर दिया कि यहां सत्ता की दहलीज वही पार करता है, जो जनता के दिल, राज्य की जमीन और वहां की संस्कृति से जुड़ा होता है।
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