प्रो0 (डॉ०) वीरेन्द्र नारायण यादव
-सदस्य, बिहार विधान परिषद
-पूर्व विभागाध्यक्ष हिन्दी सह संकायाध्यक्ष, जेपीयू
- व्यवस्था के विरुद्ध संवेदनशील प्रतिरोध
- अस्तित्व का रूपक : “हेडलाइट्स की रोशनी में”
- प्रेम का आध्यात्मिक विस्तार
- लोक-संवेदना और प्रकृति
- भाषा और शिल्प
- ग़ज़ल का बदलता मुहावरा
- निजी अनुभव का सामाजिक विस्तार
- करुणा का सामाजिक सौन्दर्य
- प्रतिरोध का सौन्दर्यशास्त्र
- प्रकृति : दृश्य नहीं, संवेदना
- भाषा की बहुलता
- शिल्पगत पक्ष
- समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में स्थान
- निष्कर्ष
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समकालीन हिन्दी कविता और हिन्दी ग़ज़ल आज ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रही हैं जहाँ एक ओर परम्परा की दीर्घ सांस्कृतिक विरासत है तो दूसरी ओर डिजिटल सभ्यता, राजनीतिक विडम्बनाएँ, बदलते पारिवारिक सम्बन्ध और संवेदनहीन होती सामाजिक संरचना का दबाव भी है। ऐसे समय में कोई भी रचनाकार यदि केवल प्रेम लिखता है तो अधूरा लगता है, और यदि केवल प्रतिरोध लिखता है तो उसकी कविता एकांगी हो जाती है। डॉ. अमित रंजन का काव्य-संग्रह “मौसिकी : अहसासों का आसमान” इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि इसमें प्रेम और प्रतिरोध, करुणा और व्यंग्य, निजी स्मृति और सामाजिक विवेक एक साथ उपस्थित हैं।
यह संग्रह अपने शीर्षक से ही संकेत देता है कि कवि शब्दों का संगीत रचने आया है, किन्तु यह संगीत मनोरंजन का नहीं, संवेदनाओं का है। यहाँ “मौसिकी” केवल लय नहीं, बल्कि जीवन का स्पंदन है और “अहसासों का आसमान” उस मानवीय विस्तार का प्रतीक है जहाँ प्रेम, पीड़ा, न्याय, स्मृति और विद्रोह एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
प्रेम : आकर्षण से आत्मीयता तक
संग्रह की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि प्रेम की उसकी परिपक्व अवधारणा है। हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल की परम्परा में प्रेमिका का सौन्दर्य, विरह, मिलन और प्रतीक्षा प्रमुख रहे हैं; किन्तु डॉ. अमित रंजन प्रेम को जीवन की साझेदारी में बदल देते हैं।
उनका यह शेर देखिए—
“जो जिसकी आँखों में शरारत थी, महबूबा थी कभी,
थक के जो मुस्काती है अब, वही मेरी घरवाली है।”
यहाँ “महबूबा” और “घरवाली” के बीच कोई विरोध नहीं है। यह प्रेम की परिपक्व यात्रा है। आकर्षण का स्थान विश्वास ने ले लिया है। रोमांस का स्थान उत्तरदायित्व ने। यही शेर संग्रह को सामान्य प्रेम-कविता से अलग पहचान देता है।
आगे कवि लिखता है—
“इश्क़ लम्हों का नशा था तो महकता था बहुत,
उम्र भर साथ रहे, बस वही खुशहाली है।”
यहाँ प्रेम क्षणिक उत्तेजना नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।
इश्क़ का दार्शनिक विस्तार
संग्रह में प्रेम केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। वह जीवन-दर्शन का रूप ग्रहण कर लेता है—
“इश्क़ जहाँ रहता है, दिल बूढ़ा नहीं होता,
लोगों का भरम है कि ये किस्सा नहीं होता।”
यह शेर फ़ैज़ और बशीर बद्र की परम्परा की याद अवश्य दिलाता है, किन्तु उसका निष्कर्ष पूरी तरह समकालीन है। कवि के लिए प्रेम उम्र का नहीं, चेतना का विषय है।
विरह में आत्मसम्मान
डॉ. अमित रंजन की ग़ज़लों का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे विरह को आत्मदया नहीं बनने देते।
उदाहरणार्थ—
“आज आईने से भी आँख मिलाना छोड़ दिया।”
और—
“अब किसी के याद करने का बहाना छोड़ दिया।”
इन पंक्तियों में टूटन है, किन्तु आत्महीनता नहीं। कवि अपने दर्द को गरिमा के साथ जीता है।
समय का कवि
यह संग्रह केवल प्रेम का दस्तावेज़ नहीं है। यह अपने समय की बेचैनियों को भी दर्ज करता है।
कवि लिखता है—
“ये बुलंदी तो महज़ पल भर का इक तमाशा है,
तख़्त का सारा गुरूर आख़िर मिटा जाता है।”
यह शेर केवल सत्ता की आलोचना नहीं करता; यह इतिहास का शाश्वत सत्य भी उद्घाटित करता है कि समय से बड़ा कोई शासक नहीं।
इसी ग़ज़ल का यह शेर भी उल्लेखनीय है—
“बारिश का इक क़तरा ही चेहरा मिटा जाता है।”
यहाँ “बारिश” परिवर्तन का रूपक है और “चेहरा” सत्ता के कृत्रिम वैभव का।
व्यवस्था के विरुद्ध संवेदनशील प्रतिरोध
संग्रह की एक प्रमुख उपलब्धि उसका नैतिक प्रतिरोध है। कवि नारे नहीं लिखता; वह मनुष्य की अनुपस्थिति दर्ज करता है—
“भीड़ को सोच बना कर जश्न में ढाला गया,
मर रहा जो चुपचाप, उसे गिनता कोई नहीं।”
और—
“ताली बजती रही हर झूठे ऐलान पर,
भूख को मुद्दा समझ कर पूछता कोई नहीं।”
ये शेर समकालीन लोकतांत्रिक समाज की सबसे बड़ी विडम्बना को उद्घाटित करते हैं। भीड़ मौजूद है, उत्सव मौजूद है, घोषणाएँ मौजूद हैं—अनुपस्थित है तो केवल मनुष्य।
यही वह बिन्दु है जहाँ यह संग्रह निजी काव्य न रहकर सामाजिक दस्तावेज़ बन जाता है।
स्त्री-विमर्श : करुणा नहीं, न्याय की माँग
इस संग्रह की सबसे प्रभावशाली उपलब्धियों में मुक्तछंद कविता “स्त्री-देह की जिरह में खड़ी इंसानियत” है। यह कविता किसी घटना का विवरण नहीं, बल्कि न्याय-व्यवस्था और सामाजिक मानसिकता पर एक गंभीर प्रश्नपत्र है। कवि लिखता है—
“स्त्री की देह
न तो अपराध का स्थल है,
न ही न्याय का औज़ार—
वह भी
एक मनुष्य ही है।”
इन पंक्तियों में स्त्री-विमर्श का मूल प्रश्न उपस्थित है। कवि स्त्री को दया का पात्र नहीं बनाता, बल्कि उसकी मनुष्यता की पुनर्स्थापना की माँग करता है। यही कविता आगे और अधिक मार्मिक हो उठती है—
“कि न्याय की दृष्टि
मेरा चरित्र नहीं
मेरे घाव देखे।”
यहाँ कवि न्यायपालिका, समाज और मीडिया—तीनों से एक साथ संवाद करता है। कविता का समापन अत्यन्त प्रभावशाली है—
“स्त्री होना
कोई परिस्थिति नहीं
जिसे सहन किया जाए,
बल्कि एक मनुष्य होना है
जिसे सम्मान दिया जाए।”
यह कविता संग्रह की वैचारिक ऊँचाई का प्रतिनिधित्व करती है और इसे समकालीन स्त्री-विमर्श की उल्लेखनीय रचनाओं की पंक्ति में खड़ा करती है।
अस्तित्व का रूपक : “हेडलाइट्स की रोशनी में”
“हेडलाइट्स की रोशनी में” कविता आधुनिक मनुष्य की मानसिक यात्रा का रूपक है। प्रारम्भ में कवि भ्रम, अकेलेपन और आत्मसंशय से घिरा दिखाई देता है—
“उस रात
काली सड़क पगला गयी थी…”
किन्तु कविता का चरम बिन्दु तब आता है जब कवि स्वयं स्वीकार करता है—
“झेंप उठी,
अहसास हुआ
न सड़क पगलायी थी,
न मैं…”
और अंततः—
“सामने था
सीधा सपाट साफ़ रास्ता
हेडलाइट्स की रोशनी में।”
यह केवल सड़क का दृश्य नहीं, बल्कि आत्मबोध का क्षण है। कवि बाहरी अँधेरे से अधिक भीतर के अँधेरे को पहचानता है। यह कविता अस्तित्ववादी संवेदना और सामाजिक यथार्थ का सुंदर समन्वय है।
गाँव और आधुनिकता का द्वंद्व “निर्दोष प्रेम के खेत में आधुनिकता की आँधी” संग्रह की उन कविताओं में है जहाँ कवि ग्रामीण संस्कृति के क्षरण पर गहरी चिंता व्यक्त करता है।
वह लिखता है—
“प्यार यहाँ ज़ोर नहीं करता,
कुआँ और पीपल के बीच
चुपचाप जीता है।”
यहाँ प्रेम प्रदर्शन नहीं, जीवन-पद्धति है।
लेकिन अगले ही क्षण आधुनिकता का हस्तक्षेप दिखाई देता है—
“मोबाइल की रोशनी
धीरे-धीरे
दीपक की लौ निगल रही है।”
यह बिम्ब अत्यन्त सशक्त है। मोबाइल यहाँ केवल उपकरण नहीं, सांस्कृतिक परिवर्तन का प्रतीक है।
फिर भी कवि निराशावादी नहीं है—
“हर बीज में ज़िद बाकी है…”
यही आशावाद संग्रह की नैतिक शक्ति है।
प्रेम का आध्यात्मिक विस्तार
“ऐसा करना” कविता संग्रह की सर्वाधिक कोमल रचनाओं में है। इसमें प्रेम देह से ऊपर उठकर आत्माओं के मिलन का रूप ले लेता है—
“कुछ तुम मुझमें रह जाओ यूँ,
कुछ मैं तुममें ढल जाऊँ।”
और अंततः—
“नाम, देह, पहचान मिटाकर,
बस प्रेम में गुम हो जाना।”
यहाँ प्रेम सूफ़ी दर्शन की याद दिलाता है, जहाँ ‘मैं’ और ‘तुम’ का भेद समाप्त हो जाता है।
लोक-संवेदना और प्रकृति
“बस एक झलक अल्हड़ गोरी की” कविता लोकगीत की सहजता लिए हुए है। उदाहरण देखिए—
“सरसों चुपके मुस्का देती
खेतों की लहरी पर…”
और—
“बस एक झलक अल्हड़ गोरी की—
जैसे ओस की बूँद में सूरज मुस्काया हो।”
यहाँ प्रकृति और प्रेम का विलय अत्यन्त स्वाभाविक है। कवि कृत्रिम अलंकारों के स्थान पर दृश्यात्मक बिम्बों से काम लेता है।
भाषा और शिल्प
डॉ. अमित रंजन की भाषा का सबसे बड़ा गुण उसकी बहुलता है। हिन्दी, उर्दू और लोकभाषा के शब्द सहज रूप से साथ चलते हैं। कहीं भी भाषा का प्रदर्शन नहीं है। उनकी ग़ज़लों में आधुनिक शब्दावली भी सहजता से आती है और मुक्तछंद में संवेदनात्मक लय बनी रहती है।
हाँ, कुछ ग़ज़लों में बह्र की दृष्टि से हल्की असमानताएँ दिखाई देती हैं। कुछ कविताओं में संपादकीय कसाव की भी आवश्यकता महसूस होती है। किन्तु ये सीमाएँ संग्रह की मूल रचनात्मक शक्ति को प्रभावित नहीं करतीं।
“मौसिकी : अहसासों का आसमान” प्रेम का भी दस्तावेज़ है, प्रतिरोध का भी; स्मृति का भी और भविष्य की आशा का भी। डॉ. अमित रंजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जीवन के अनेक अनुभवों को बिना किसी कृत्रिम बौद्धिकता के कविता में रूपांतरित कर देते हैं।
यह संग्रह समकालीन हिन्दी-उर्दू काव्य में उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है जो दुष्यंत कुमार की सामाजिक दृष्टि, निदा फ़ाज़ली की मानवीय आत्मीयता, बशीर बद्र की सहज भाषा और लोकजीवन की मिट्टी से संवाद करते हुए अपनी अलग पहचान बनाना चाहती है।
कुल मिलाकर “मौसिकी : अहसासों का आसमान” ऐसी कृति है जो पाठक को केवल रसास्वादन नहीं कराती, बल्कि उसे अपने समय, अपने समाज और अपने भीतर झाँकने के लिए भी विवश करती है। यही किसी भी महत्त्वपूर्ण काव्य-कृति की सबसे बड़ी पहचान होती है।
यदि “मौसिकी : अहसासों का आसमान” का मूल्यांकन केवल उसकी विषय-वस्तु के आधार पर किया जाए तो उसके साथ न्याय नहीं होगा। यह संग्रह अपनी भाषा, शिल्प, प्रतीक-योजना और अभिव्यक्ति की विविधता के कारण भी विशेष महत्व रखता है। डॉ. अमित रंजन उन रचनाकारों में हैं जो परम्परा का सम्मान करते हुए भी समकालीन जीवन की नई शब्दावली और अनुभवों को ग़ज़ल की संरचना में समाहित करने का साहस रखते हैं।
ग़ज़ल का बदलता मुहावरा
हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल की पारम्परिक दुनिया में चाँद, शमा, परवाना, गुल, बुलबुल, मयख़ाना और साक़ी जैसे प्रतीक प्रमुख रहे हैं। डॉ. अमित रंजन इन प्रतीकों से पूरी तरह विमुख नहीं होते, किन्तु वे उन्हें आधुनिक जीवन की वस्तुओं और अनुभवों से प्रतिस्थापित भी करते हैं। यही कारण है कि उनके यहाँ प्रेम केवल ख़तों में नहीं, डिजिटल समय में भी साँस लेता है।
संग्रह की कई ग़ज़लों में मोबाइल, ऐप, डेटा, मेमोरी, नेटवर्क, अपडेट और ऑनलाइन जैसे शब्द केवल सजावट नहीं, बल्कि नए युग के बिंब हैं। यह प्रयोग ग़ज़ल की परम्परा को तोड़ता नहीं, बल्कि उसका विस्तार करता है। यह वही प्रक्रिया है जिसने कभी फ़िराक़ गोरखपुरी, दुष्यंत कुमार और बशीर बद्र को अपने समय का कवि बनाया था।
निजी अनुभव का सामाजिक विस्तार
डॉ. अमित रंजन की ग़ज़लों की एक बड़ी विशेषता यह है कि वे निजी अनुभव को सामाजिक अनुभव में बदल देती हैं। उदाहरण के लिए—
“जो जिसकी आँखों में शरारत थी, महबूबा थी कभी,
थक के जो मुस्काती है अब, वही मेरी घरवाली है।”
यह शेर केवल पति-पत्नी के रिश्ते का बयान नहीं है। यह प्रेम की उस परिपक्वता का उत्सव है जिसमें आकर्षण से अधिक विश्वास और साझेदारी का महत्व है। यही कारण है कि यह शेर सामान्य पाठक के अनुभव का भी हिस्सा बन जाता है।
करुणा का सामाजिक सौन्दर्य
कवि की दृष्टि केवल अपने दुख तक सीमित नहीं रहती। वह समाज के हाशिए पर खड़े मनुष्य को भी अपनी कविता का केन्द्र बनाता है। ‘हेडलाइट्स की रोशनी में’ कविता में एक बूढ़े व्यक्ति का हाथ पकड़कर सड़क पार कराते अनाम व्यक्ति का दृश्य केवल मानवीय करुणा नहीं, बल्कि पूरी कविता का नैतिक उत्कर्ष है। वहाँ कवि अंततः स्वीकार करता है—
“सामने था
सीधा सपाट साफ़ रास्ता
हेडलाइट्स की रोशनी में।”
यह रास्ता केवल सड़क का नहीं, आत्मबोध का भी है।
प्रतिरोध का सौन्दर्यशास्त्र
समकालीन कविता में प्रतिरोध अक्सर घोषणापत्र बन जाता है, परन्तु डॉ. अमित रंजन की कविता में प्रतिरोध संवेदना से उपजता है। यही कारण है कि उनकी कविताएँ नारे नहीं बनतीं।
स्त्री-विमर्श पर लिखी कविता में कवि का स्वर देखिए—
“कि न्याय की दृष्टि
मेरा चरित्र नहीं,
मेरे घाव देखे।”
इन पंक्तियों की शक्ति इनके संयम में है। यहाँ आक्रोश है, परन्तु शालीनता के साथ; पीड़ा है, परन्तु विलाप नहीं।
प्रकृति : दृश्य नहीं, संवेदना
इस संग्रह में प्रकृति केवल सजावटी तत्व नहीं है। वह मानवीय मनःस्थिति का विस्तार बन जाती है। उदाहरणार्थ—
“मोबाइल की रोशनी
धीरे-धीरे
दीपक की लौ निगल रही है।”
यहाँ दीपक केवल प्रकाश का स्रोत नहीं, भारतीय सांस्कृतिक स्मृति का प्रतीक है, जबकि मोबाइल आधुनिक जीवन का। दोनों के बीच का तनाव पूरी कविता को अर्थवत्ता प्रदान करता है।
भाषा की बहुलता
डॉ. अमित रंजन की भाषा हिन्दी, उर्दू और लोक-भाषा के स्वाभाविक मेल से निर्मित है। वे कठिन फ़ारसी या अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के मोह में नहीं पड़ते। उनकी भाषा पाठक से संवाद करती है, उस पर अपनी विद्वत्ता नहीं थोपती।
यही कारण है कि संग्रह की कविताएँ मंच पर भी प्रभाव छोड़ती हैं और एकांत पाठ में भी।
शिल्पगत पक्ष
ग़ज़लों में रदीफ़ और क़ाफ़िया का निर्वाह अधिकांशतः संतोषजनक है। कहीं-कहीं बह्र की दृष्टि से हल्के विचलन मिलते हैं, परन्तु वे कवि की संवेदनात्मक शक्ति को कम नहीं करते। यदि आगामी संस्करणों में इन पर तकनीकी दृष्टि से और श्रम किया जाए तो संग्रह का साहित्यिक महत्व और बढ़ेगा।
समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में स्थान
समकालीन हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा में दुष्यंत कुमार ने राजनीतिक चेतना, अदम गोंडवी ने सामाजिक असमानता, बशीर बद्र ने मानवीय रिश्तों और निदा फ़ाज़ली ने जीवन-दर्शन को नई भाषा दी। डॉ. अमित रंजन का योगदान इस अर्थ में विशिष्ट है कि वे इन सभी धाराओं के बीच रहते हुए डिजिटल युग, न्यायिक अनुभव, पत्रकारिता और पारिवारिक जीवन को ग़ज़ल की संवेदना से जोड़ते हैं।
वे किसी एक परम्परा की पुनरावृत्ति नहीं करते, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान निर्मित करने का प्रयास करते हैं।
निष्कर्ष
“मौसिकी : अहसासों का आसमान” केवल पढ़े जाने योग्य काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि समकालीन हिन्दी साहित्य में बदलती संवेदनाओं का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी ईमानदारी है। यह संग्रह पाठक को चमत्कृत करने के बजाय उसके भीतर विचार, करुणा और आत्मसंवाद जगाता है।
ऐसी कृतियाँ समय के साथ केवल साहित्य का हिस्सा नहीं रहतीं, बल्कि अपने समय की सांस्कृतिक स्मृति बन जाती हैं। “मौसिकी : अहसासों का आसमान” में यह संभावना स्पष्ट रूप से विद्यमान है।
- संपर्क: महमूद चौक, छपरा- 841301
- मोबाईल: 9431216822



















