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उत्तरायण : परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है

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डॉ प्रशांत सिन्हा

सूर्य का उत्तरायण हमें यह सीख देता है परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। नई दिशा का प्रतीक उत्तरायण भारतीय संस्कृति में सूर्य के उत्तर की ओर बढ़ने का उत्सव है, जो मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। संक्रांति का सीधा संबंध सूर्य से है। यह वह समय होता है जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है, ठंड के दिनों को अलविदा कहते हुए ग्रीष्म की ओर इशारा करता है। उत्तरायण न केवल मौसमी परिवर्तन का प्रतीक है, बल्कि जीवन में नए आरंभ और आशा का संदेश भी देता है। हर परिवर्तन, चाहे वह प्रकृति का हो या व्यक्तिगत जीवन का, नए लक्ष्यों के रास्ते खोलता है।

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मकर संक्रांति, जिसे उत्तरायण की शुरुआत कहा जाता है, पूरे भारत में विभिन्न नामों से मनाई जाती है। उत्तर भारत में इसे संक्रांति या पोंगल के रूप में, जबकि पंजाब और हरियाणा में लोहड़ी के रूप में उत्साहित मनाया जाता है। इस दिन तिल-गुड़ का प्रसाद वितरित किया जाता है, जो सूर्य देव की पूजा का प्रतीक है। संक्रांति धार्मिक महत्व के साथ-साथ कृषि प्रधान समाज के लिए फसल कटाई का जश्न भी है। यह हमें सिखाता है कि सूर्य का उत्तरायण यात्रा कैसे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, ठीक वैसे ही जीवन में चुनौतियां नए अवसर उत्पन्न करती हैं। मान्यताओं के अनुसार इसी दिन से शुभ कार्यों की शुरुआत की जाती है।

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लोहड़ी उत्तरायण का एक जीवंत रूप है, जो मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और दिल्ली-एन सी आर क्षेत्र में धूमधाम से मनाई जाती है। यह त्योहार 13 जनवरी को आग के गोले जलाकर, मूंगफली, तिल और गुड़ बांटकर मनाया जाता है। आग के चारों ओर नाच-गाना, भांगड़ा और ढोल की थाप जीवन की ऊर्जा को दर्शाती है। लोहड़ी का जिक्र दुल्ल्हा भट्टी की लोककथा से जुड़ा है, जो गरीबों की मदद का प्रतीक है। यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि सर्दी की कठोरता के बाद गर्मी का आगमन होता है, जो हर परिवर्तन को सकारात्मक ऊर्जा से जोड़ता है।

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उत्तरायण का एक और आकर्षक हिस्सा है पतंगबाजी, खासकर गुजरात के ऊंट उत्सव और मकर संक्रांति में। आकाश में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ती हुईं आसमान को सजाती हैं, जो स्वतंत्रता और उड़ान का प्रतीक हैं। ‘काटो पतंग’ की होड़ में लोग एक-दूसरे की पतंगें काटते हैं, लेकिन यह प्रतिस्पर्धा दोस्ती और उत्साह बढ़ाती है। पतंगबाजी सिखाती है कि जीवन में बाधाओं को पार कर ऊंचाइयों को छूना संभव है। यह परिवर्तन का उत्सव है, जहां पुरानी पतंगें कट जाती हैं, लेकिन नई उड़ान भरने को तैयार रहती हैं। उत्तरायण हमें यह संदेश देता है कि हर परिवर्तन चाहे संक्रांति का सूर्योदय हो, लोहड़ी की आग हो या पतंगबाजी की उड़ान नए लक्ष्यों के रास्ते खोलता है।

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प्रकृति की तरह जीवन भी चक्रवत चलता है । सर्दी के बाद बसंत आता है, हार के बाद जीत। यह त्योहार पर्यावरणीय जागरूकता भी जगाता है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के दौर में मौसमी बदलाव महत्वपूर्ण हो गए हैं। इसलिए, उत्तरायण मनाते हुए हम संकल्प लें कि हर बदलाव को अपनाकर नई ऊंचाइयों को छुएं।

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