छपरा शहर के उत्तरी दहियावाँ टोला स्थित ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक केंद्र श्री कामता सखी मठ अमूल्य धरोहर के रूप में विद्यमान है। यह मठ वर्षों से भक्ति, लोकभाषा साहित्य, सामाजिक समरसता एवं आध्यात्मिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। श्री कामता सखी मठ की स्थापना वर्ष 1919 में महान तपस्वी, संत-कवि महात्मा कामता सखी द्वारा की गई थी। वे संत, कवि लक्ष्मी सखी के शिष्य और सखी संप्रदाय के प्रर्वतक थें। दूर-दूर से भक्तगण समाधि का दर्शन करने तथा चादर चढ़ाने, मन्नत मांगने तथा माथा टेकने आते है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ आने वाले की मनोकामना पूरी होती है। संत श्री कामता सखी का जन्म सिवान जिले के बसंतपुर थाना क्षेत्र में सिकटीया ग्राम में लगभग एक सौ चालीस वर्ष पूर्व 16 दिसम्बर 1885 को हुआ था। उनके पिता का नाम मुंशी महेन्द्र लाल एवं माता का नाम रामकली देवी था। प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण कर वे छपरा कॉलेजिएट स्कूल में शिक्षक हुए फिर अपने आत्मज्ञान के बल पर सामाजिक मोह माया को त्याग कर संत हुए और यहाँ एक कुटिया बनाई। संत कामता सखी के एक पुत्र थे अविनाशी सखी, वे भी भोजपुरी के महान कवि एवं संत हुए उन्होने सन् 1990 में इसी आश्रम में अपनी समाधि लगाई। महात्मा लक्ष्मी जी के कैथी लिपि में एक पुस्तक की रचना की थी, जिसका नाम ग्रंथरामजी रखा था। जिसको महात्मा कामना सखी ने इस पुस्तक को चार भाग कर अमर सिढ़ी, अमर कहानी, अमर विलास , अमर फारस के नाम से भोजपुरी में पुस्तक विख्यात हुआ। इन सभी पुस्तकों में लगभग चार हजार भजन है। जिनमें होली, चैता, चातुरमासा, झुलना, सोहर, विवाह-गारी, निर्गुन शब्द एवं अन्य के उल्लेख किए गए हैं। बिहार की सांस्कृतिक विरासत को बड़ी पहचान: नालंदा की बावन बूटी, गया स्टोन क्राफ्ट और भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग को मिला GI टैग उन्होंने 24 जुलाई 1964 में अपने इच्छा शक्ति से समाधि लगा ली। उन्होंने अपने जीवन में ही इस पुस्तक की पूजा पौष पूर्णिमा के दिन शुरू की थी। इसी दिन सभी सखी सम्प्रदाय के मठों में इसकी पूजा अर्चना की जाती है। संत कामता सखी भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉo राजेन्द्र प्रसाद के आध्यात्मिक गुरू थें। वर्ष 1962–63 के दौरान पटना से लिखे गए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के पत्र आज भी श्री कामता सखी मठ की अमूल्य धरोहर के रूप में संग्रहीत हैं। उन्होंने अपने पत्रों में लिखा है कि संत सान्निध्य उन्हें आंतरिक शक्ति, धैर्य और आध्यात्मिक संबल प्रदान करता था। जेपीयू मोबिल कांड: छात्र नेता विशाल सिंह की गिरफ्तारी पर भड़का शोध छात्र संगठन श्री कामता सखी मठ केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और नैतिक मार्गदर्शन का भी महत्वपूर्ण स्थल रहा है। 3 जनवरी 2026 (शनिवार) को पौष पूर्णिमा के पावन अवसर पर 108वां वार्षिकोत्सव श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जा रहा है। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का पर्व होता है, बल्कि संत-परंपरा का स्मरण भी कराता है। मठ परिवार की ओर से बताया गया कि यह वार्षिकोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि संत-कवि महात्मा कामता सखी की आध्यात्मिक विरासत, सामाजिक संदेश और राष्ट्रीय योगदान को स्मरण करने का पावन अवसर है। शिक्षकों की लंबित समस्याओं के समाधान को लेकर डॉ राहुल राज ने शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव से की मुलाकात
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छपरा शहर के उत्तरी दहियावाँ टोला स्थित ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक केंद्र श्री कामता सखी मठ अमूल्य धरोहर के रूप में विद्यमान है। यह मठ वर्षों से भक्ति, लोकभाषा साहित्य, सामाजिक समरसता एवं आध्यात्मिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। श्री कामता सखी मठ की स्थापना वर्ष 1919 में महान तपस्वी, संत-कवि महात्मा कामता सखी द्वारा की गई थी। वे संत, कवि लक्ष्मी सखी के शिष्य और सखी संप्रदाय के प्रर्वतक थें।
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दूर-दूर से भक्तगण समाधि का दर्शन करने तथा चादर चढ़ाने, मन्नत मांगने तथा माथा टेकने आते है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ आने वाले की मनोकामना पूरी होती है। संत श्री कामता सखी का जन्म सिवान जिले के बसंतपुर थाना क्षेत्र में सिकटीया ग्राम में लगभग एक सौ चालीस वर्ष पूर्व 16 दिसम्बर 1885 को हुआ था। उनके पिता का नाम मुंशी महेन्द्र लाल एवं माता का नाम रामकली देवी था। प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण कर वे छपरा कॉलेजिएट स्कूल में शिक्षक हुए फिर अपने आत्मज्ञान के बल पर सामाजिक मोह माया को त्याग कर संत हुए और यहाँ एक कुटिया बनाई। संत कामता सखी के एक पुत्र थे अविनाशी सखी, वे भी भोजपुरी के महान कवि एवं संत हुए उन्होने सन् 1990 में इसी आश्रम में अपनी समाधि लगाई।
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महात्मा लक्ष्मी जी के कैथी लिपि में एक पुस्तक की रचना की थी, जिसका नाम ग्रंथरामजी रखा था। जिसको महात्मा कामना सखी ने इस पुस्तक को चार भाग कर अमर सिढ़ी, अमर कहानी, अमर विलास , अमर फारस के नाम से भोजपुरी में पुस्तक विख्यात हुआ। इन सभी पुस्तकों में लगभग चार हजार भजन है। जिनमें होली, चैता, चातुरमासा, झुलना, सोहर, विवाह-गारी, निर्गुन शब्द एवं अन्य के उल्लेख किए गए हैं।
उन्होंने 24 जुलाई 1964 में अपने इच्छा शक्ति से समाधि लगा ली। उन्होंने अपने जीवन में ही इस पुस्तक की पूजा पौष पूर्णिमा के दिन शुरू की थी। इसी दिन सभी सखी सम्प्रदाय के मठों में इसकी पूजा अर्चना की जाती है।
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संत कामता सखी भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉo राजेन्द्र प्रसाद के आध्यात्मिक गुरू थें। वर्ष 1962–63 के दौरान पटना से लिखे गए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के पत्र आज भी श्री कामता सखी मठ की अमूल्य धरोहर के रूप में संग्रहीत हैं। उन्होंने अपने पत्रों में लिखा है कि संत सान्निध्य उन्हें आंतरिक शक्ति, धैर्य और आध्यात्मिक संबल प्रदान करता था।
श्री कामता सखी मठ केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और नैतिक मार्गदर्शन का भी महत्वपूर्ण स्थल रहा है।
3 जनवरी 2026 (शनिवार) को पौष पूर्णिमा के पावन अवसर पर 108वां वार्षिकोत्सव श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जा रहा है। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का पर्व होता है, बल्कि संत-परंपरा का स्मरण भी कराता है। मठ परिवार की ओर से बताया गया कि यह वार्षिकोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि संत-कवि महात्मा कामता सखी की आध्यात्मिक विरासत, सामाजिक संदेश और राष्ट्रीय योगदान को स्मरण करने का पावन अवसर है।
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