पटना, 15 अप्रैल (हि.स.)। बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में आगे बढ़ाने को लेकर राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ गई है। वहीं भारतीय जनता पार्टी के भीतर ही इस रणनीति को लेकर असहजता और मौन असंतोष की चर्चा तेज हो गई है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, संगठन के जमीनी स्तर पर लंबे समय से सक्रिय कार्यकर्ताओं के बीच उत्साह की जगह एक ठहरी हुई प्रतिक्रिया देखी जा रही है। कई कार्यकर्ता खुलकर कुछ नहीं कह रहे लेकिन अंदरखाने यह भावना जरूर उभर रही है कि निर्णय प्रक्रिया में कैडर की भूमिका और संवाद पहले की तुलना में कमजोर हुआ है। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने से एक ओर भाजपा की राजनीतिक रणनीति को नई दिशा मिली है तो वहीं संगठन के भीतर संवाद और भागीदारी को लेकर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह होगा कि क्या भाजपा इस मौन असंतोष को समय रहते संभाल पाती है या यह चर्चा आने वाले दिनों में और गहराती है। वैभव सूर्यवंशी बने भारतीय टीम के लिए चुने जाने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी कैडर की चुप्पी के पीछे क्या वजह? भाजपा का पारंपरिक ढांचा हमेशा मजबूत बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं पर आधारित रहा है। लेकिन, हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों में यह सवाल उठने लगा है कि क्या शीर्ष स्तर पर नेतृत्व चयन की प्रक्रिया में जमीनी कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं पूरी तरह शामिल हो पा रही हैं? कुछ पुराने कार्यकर्ताओं का मानना है कि लंबे समय तक संगठन में काम करने वाले नेताओं की तुलना में अचानक उभरते चेहरों को प्राथमिकता देना एक तरह की संगठनात्मक असहजता एवं असंताेष पैदा कर रहा है। आयरलैंड और इंग्लैंड के खिलाफ टी-20 शृंखला के लिए भारतीय टीम घोषित, श्रेयस अय्यर बने कप्तान नेतृत्व बनाम संगठन, संतुलन की चुनौती राजनीतिक विश्लेषक लव कुमार मिश्र का मानना है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासित कैडर और बूथ मैनेजमेंट रहा है लेकिन, यदि यही कैडर किसी निर्णय को लेकर खुद को दरकिनार महसूस करने लगे तो इसका सीधा असर चुनावी मशीनरी पर पड़ सकता है। वे मानते हैं कि किसी भी बड़े राजनीतिक दल में नेतृत्व का उभार जरूरी होता है, लेकिन उतना ही जरूरी होता है संगठनात्मक संतुलन और कार्यकर्ताओं की भागीदारी का भरोसा बनाए रखना। अंडर-18 एशिया कप : जापान को 4-1 से हराकर भारतीय पुरुष हॉकी टीम बनी चैंपियन व्यापक स्वीकार्यता या राजनीतिक भ्रम हालांकि, पार्टी नेतृत्व इन सभी चर्चाओं को खारिज कर रहा है। शीर्ष स्तर के नेताओं का कहना है कि संगठन पूरी तरह एकजुट है और किसी प्रकार की नाराजगी या मतभेद की स्थिति नहीं है। उनके अनुसार, सम्राट चौधरी के नेतृत्व को लेकर कैडर में व्यापक स्वीकार्यता है और यह केवल विपक्ष द्वारा फैलाया गया राजनीतिक भ्रम है। राजनीतिक संकेत या सामान्य असहमति? इसके बावजूद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जारी है कि क्या यह केवल सामान्य असहमति है या फिर संगठन के भीतर एक धीमी गति से विकसित हो रहा मौन असंतोष है, जो आने वाले समय में किसी बड़े राजनीतिक संकेत में बदल सकता है।
खबर सुनें
▶ Press play to listen
⚠️ आपका ब्राउज़र Text-to-Speech को सपोर्ट नहीं करता।
पटना, 15 अप्रैल (हि.स.)। बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में आगे बढ़ाने को लेकर राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ गई है। वहीं भारतीय जनता पार्टी के भीतर ही इस रणनीति को लेकर असहजता और मौन असंतोष की चर्चा तेज हो गई है।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, संगठन के जमीनी स्तर पर लंबे समय से सक्रिय कार्यकर्ताओं के बीच उत्साह की जगह एक ठहरी हुई प्रतिक्रिया देखी जा रही है। कई कार्यकर्ता खुलकर कुछ नहीं कह रहे लेकिन अंदरखाने यह भावना जरूर उभर रही है कि निर्णय प्रक्रिया में कैडर की भूमिका और संवाद पहले की तुलना में कमजोर हुआ है। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने से एक ओर भाजपा की राजनीतिक रणनीति को नई दिशा मिली है तो वहीं संगठन के भीतर संवाद और भागीदारी को लेकर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह होगा कि क्या भाजपा इस मौन असंतोष को समय रहते संभाल पाती है या यह चर्चा आने वाले दिनों में और गहराती है।
भाजपा का पारंपरिक ढांचा हमेशा मजबूत बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं पर आधारित रहा है। लेकिन, हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों में यह सवाल उठने लगा है कि क्या शीर्ष स्तर पर नेतृत्व चयन की प्रक्रिया में जमीनी कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं पूरी तरह शामिल हो पा रही हैं? कुछ पुराने कार्यकर्ताओं का मानना है कि लंबे समय तक संगठन में काम करने वाले नेताओं की तुलना में अचानक उभरते चेहरों को प्राथमिकता देना एक तरह की संगठनात्मक असहजता एवं असंताेष पैदा कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक लव कुमार मिश्र का मानना है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासित कैडर और बूथ मैनेजमेंट रहा है लेकिन, यदि यही कैडर किसी निर्णय को लेकर खुद को दरकिनार महसूस करने लगे तो इसका सीधा असर चुनावी मशीनरी पर पड़ सकता है। वे मानते हैं कि किसी भी बड़े राजनीतिक दल में नेतृत्व का उभार जरूरी होता है, लेकिन उतना ही जरूरी होता है संगठनात्मक संतुलन और कार्यकर्ताओं की भागीदारी का भरोसा बनाए रखना।
हालांकि, पार्टी नेतृत्व इन सभी चर्चाओं को खारिज कर रहा है। शीर्ष स्तर के नेताओं का कहना है कि संगठन पूरी तरह एकजुट है और किसी प्रकार की नाराजगी या मतभेद की स्थिति नहीं है। उनके अनुसार, सम्राट चौधरी के नेतृत्व को लेकर कैडर में व्यापक स्वीकार्यता है और यह केवल विपक्ष द्वारा फैलाया गया राजनीतिक भ्रम है।
राजनीतिक संकेत या सामान्य असहमति?
इसके बावजूद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जारी है कि क्या यह केवल सामान्य असहमति है या फिर संगठन के भीतर एक धीमी गति से विकसित हो रहा मौन असंतोष है, जो आने वाले समय में किसी बड़े राजनीतिक संकेत में बदल सकता है।
chhapratoday.com सारण जिले से संचालित सबसे पहली और लोकप्रिय न्यूज़ वेबसाइट है। वर्ष 2012 से यह अपने पाठकों/दर्शकों तक हर दिन सबसे पहले छपरा, सारण से लेकर देश, विदेश के ब्रेकिंग न्यूज़, लोकल घटनाएं, रेलवे टाइमिंग अपडेट, सरकारी योजनाएं, स्कूल-कॉलेज जानकारी, ट्रेंडिंग वीडियो, संस्कृति, त्यौहार और शहर के विकास से जुड़े हर अपडेट करती आ रही है। हर खबर, सबसे पहले, सबसे सटीक और विश्वसनीयता के साथ केवल chhapratoday.com पर पढ़ें।