पटना, 07 मार्च (हि.स.)। बिहार में मुजफ्फरपुर जिले से न्याय की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने यह साबित कर दिया है कि कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं। जिले के अहियापुर थाना क्षेत्र में आज से लगभग 35 वर्ष पूर्व हुए एक रोंगटे खड़े कर देने वाले हत्याकांड में अदालत ने शनिवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जेपीयू मोबिल कांड: छात्र नेता विशाल सिंह की गिरफ्तारी पर भड़का शोध छात्र संगठन अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे-5) आलोक कुमार पाण्डेय की अदालत ने इस जघन्य अपराध के पांच दोषियों को आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा सुनाई है। यह सनसनीखेज वारदात साल 1991 की है, जब जमीनी विवाद ने एक परिवार की खुशियां उजाड़ दी थीं। शिवयहां चर्तुभुज गांव में आरोपियों ने प्रतिशोध और लालच में आकर उमा राय नाम के व्यक्ति की बेरहमी से हत्या कर दी थी। वारदात की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हमलावरों ने उमा राय की बहन, बसंती देवी को घर के पास एक पेड़ से मजबूती से बांध दिया था। बहन बेबस होकर चीखती-चिल्लाती रही, लेकिन पत्थर दिल दोषियों ने उसकी एक न सुनी और उसकी आंखों के सामने ही उसके भाई उमा राय को गोलियों से भून डाला। शिक्षकों की लंबित समस्याओं के समाधान को लेकर डॉ राहुल राज ने शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव से की मुलाकात भाई की तड़प और बहन की बेबसी के उस मंजर ने पूरे इलाके को दहला दिया था। लोक अभियोजक सुनील कुमार पाण्डेय ने बताया कि इस मामले में न्याय मिलने में साढ़े तीन दशक का लंबा समय बीत गया। इसके पीछे कई गंभीर तकनीकी कारण थे। सबसे बड़ी बाधा यह थी कि घटना के बाद उमा राय का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर की मृत्यु हो चुकी थी, जिससे मेडिकल साक्ष्य प्रस्तुत करने में चुनौती आई। इसके अतिरिक्त, केस के अनुसंधान (इन्वेस्टिगेशन) से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और कागजात भी समय के साथ ट्रेस नहीं हो पा रहे थे। इन प्रशासनिक और तकनीकी जटिलताओं के कारण मुकदमा वर्षों तक लंबित रहा, लेकिन पीड़ित पक्ष ने हार नहीं मानी और कानूनी लड़ाई जारी रखी। गांव-गांव जागरूकता की अलख जगा रहे पीएसपी सदस्य, रात्रि चौपाल से चमकी बुखार को धमकी अदालत ने गवाहों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों को गंभीरता से लेते हुए पांचों आरोपियों को हत्या सहित अन्य संबंधित धाराओं में दोषी पाया। सजा पाने वाले दोषियों में अहियापुर के शिवयहां चर्तुभुज निवासी बैद्यनाथ राय (77 वर्ष), महंथ राय (50 वर्ष), रामचंद्र पासवान (60 वर्ष), सहदेव राय (50 वर्ष) और मीनापुर के मोहनपुर निवासी रामबालक राय (70 वर्ष) शामिल हैं। उम्रकैद की सजा के साथ-साथ अदालत ने सभी पांचों दोषियों पर 50-50 हजार रुपये का अर्थदंड (जुर्माना) भी लगाया है। जुर्माने की राशि जमा न करने पर दोषियों को अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी होगी। इस कांड के सूचक और बसंती देवी के पुत्र मोहन राय ने भावुक होते हुए कहा कि उन्होंने अपनी मां की आंखों में वह खौफ और दर्द सालों तक देखा है। उन्होंने कहा, “मेरी मां को पेड़ से बांधकर उनके सगे भाई की हत्या की गई थी। वह दृश्य हमारे परिवार के लिए किसी डरावने सपने जैसा था। 35 सालों तक हमने अदालत की चौखट पर न्याय की आस में चक्कर काटे। आज जब फैसला आया है, तो ऐसा महसूस हो रहा है कि वाकई सत्य की जीत हुई है। देर से ही सही, मेरे मामा को इंसाफ मिला।”
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पटना, 07 मार्च (हि.स.)। बिहार में मुजफ्फरपुर जिले से न्याय की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने यह साबित कर दिया है कि कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं।
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जिले के अहियापुर थाना क्षेत्र में आज से लगभग 35 वर्ष पूर्व हुए एक रोंगटे खड़े कर देने वाले हत्याकांड में अदालत ने शनिवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे-5) आलोक कुमार पाण्डेय की अदालत ने इस जघन्य अपराध के पांच दोषियों को आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा सुनाई है।
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यह सनसनीखेज वारदात साल 1991 की है, जब जमीनी विवाद ने एक परिवार की खुशियां उजाड़ दी थीं। शिवयहां चर्तुभुज गांव में आरोपियों ने प्रतिशोध और लालच में आकर उमा राय नाम के व्यक्ति की बेरहमी से हत्या कर दी थी। वारदात की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हमलावरों ने उमा राय की बहन, बसंती देवी को घर के पास एक पेड़ से मजबूती से बांध दिया था। बहन बेबस होकर चीखती-चिल्लाती रही, लेकिन पत्थर दिल दोषियों ने उसकी एक न सुनी और उसकी आंखों के सामने ही उसके भाई उमा राय को गोलियों से भून डाला।
भाई की तड़प और बहन की बेबसी के उस मंजर ने पूरे इलाके को दहला दिया था।
लोक अभियोजक सुनील कुमार पाण्डेय ने बताया कि इस मामले में न्याय मिलने में साढ़े तीन दशक का लंबा समय बीत गया। इसके पीछे कई गंभीर तकनीकी कारण थे। सबसे बड़ी बाधा यह थी कि घटना के बाद उमा राय का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर की मृत्यु हो चुकी थी, जिससे मेडिकल साक्ष्य प्रस्तुत करने में चुनौती आई। इसके अतिरिक्त, केस के अनुसंधान (इन्वेस्टिगेशन) से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और कागजात भी समय के साथ ट्रेस नहीं हो पा रहे थे। इन प्रशासनिक और तकनीकी जटिलताओं के कारण मुकदमा वर्षों तक लंबित रहा, लेकिन पीड़ित पक्ष ने हार नहीं मानी और कानूनी लड़ाई जारी रखी।
अदालत ने गवाहों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों को गंभीरता से लेते हुए पांचों आरोपियों को हत्या सहित अन्य संबंधित धाराओं में दोषी पाया। सजा पाने वाले दोषियों में अहियापुर के शिवयहां चर्तुभुज निवासी बैद्यनाथ राय (77 वर्ष), महंथ राय (50 वर्ष), रामचंद्र पासवान (60 वर्ष), सहदेव राय (50 वर्ष) और मीनापुर के मोहनपुर निवासी रामबालक राय (70 वर्ष) शामिल हैं। उम्रकैद की सजा के साथ-साथ अदालत ने सभी पांचों दोषियों पर 50-50 हजार रुपये का अर्थदंड (जुर्माना) भी लगाया है। जुर्माने की राशि जमा न करने पर दोषियों को अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी होगी।
इस कांड के सूचक और बसंती देवी के पुत्र मोहन राय ने भावुक होते हुए कहा कि उन्होंने अपनी मां की आंखों में वह खौफ और दर्द सालों तक देखा है। उन्होंने कहा, “मेरी मां को पेड़ से बांधकर उनके सगे भाई की हत्या की गई थी। वह दृश्य हमारे परिवार के लिए किसी डरावने सपने जैसा था। 35 सालों तक हमने अदालत की चौखट पर न्याय की आस में चक्कर काटे। आज जब फैसला आया है, तो ऐसा महसूस हो रहा है कि वाकई सत्य की जीत हुई है। देर से ही सही, मेरे मामा को इंसाफ मिला।”
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