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नीतीश युग के बाद बिहार की सियासत की अग्निपरीक्षा

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पटना, 30 मार्च (हि.स.)। बिहार की राजनीति में लंबे समय तक स्थिरता, विकास और सुशासन का चेहरा बने नीतीश कुमार के विधान परिषद से इस्तीफे के बाद राज्य की सियासत में बड़े बदलाव की आहट महसूस की जा रही है। राजनीतिक विश्लेषक वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र मानते हैं कि नीतीश के राजनीतिक सफर, शासन शैली और बड़े फैसलों को समझे बिना बिहार की वर्तमान राजनीति को समझना अधूरा है। उनके फैसले, प्रयोग और गठबंधन की राजनीति ने न सिर्फ राज्य, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया है। उनका राजनीतिक जीवन बिहार की सामाजिक-आर्थिक दिशा को बदलने वाली कहानी भी है।

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राजनीतिक पृष्ठभूमि: संघर्ष से शिखर तक

नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर छात्र जीवन से ही शुरू हुआ। वे जेपी आंदोलन से जुड़े और समाजवादी विचारधारा से गहराई से प्रभावित हुए। शुरुआती दौर में उन्होंने संघर्ष के बीच अपनी पहचान बनाई और धीरे-धीरे राजनीति में मजबूत पकड़ बनाई। केंद्र में उन्होंने रेल मंत्री और कृषि मंत्री जैसे अहम मंत्रालय संभाले, जहां उनके कामकाज को सराहा गया। रेल मंत्री के रूप में उन्होंने कई सुधारात्मक कदम उठाए, जिससे उनकी प्रशासनिक क्षमता का परिचय मिला। बिहार में लंबे समय तक लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाले शासन के बाद, उन्होंने खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया और जनता के बीच ‘परिवर्तन की उम्मीद’ के प्रतीक बन गए।

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‘सुशासन बाबू’ की छवि

नीतीश कुमार की सबसे बड़ी पहचान ‘सुशासन बाबू’ के रूप में बनी। इसके पीछे कई ठोस काम रहे। कानून-व्यवस्था में सुधार होने से अपराध पर नियंत्रण और प्रशासनिक सख्ती ने लोगों में सुरक्षा का भरोसा जगाया। गांव-गांव तक सड़कें, पुल और कनेक्टिविटी बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिली। साइकिल और पोशाक योजना जैसी पहल ने खासकर छात्राओं की शिक्षा में बड़ा बदलाव लाया। स्कूलों में उपस्थिति बढ़ी और ड्रॉपआउट दर घटी। पंचायत और निकाय चुनावों में 50 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्होंने महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया।

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बड़े और निर्णायक फैसले

नीतीश कुमार के कार्यकाल में कई ऐसे फैसले लिए गए, जिनका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव दूरगामी रहा। बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू कर उन्होंने एक बड़ा सामाजिक प्रयोग किया। इसका उद्देश्य नशामुक्त समाज बनाना था। हालांकि इसके क्रियान्वयन को लेकर लगातार बहस और विवाद भी चलते रहे। सात निश्चय योजना के तहत हर घर नल का जल, पक्की गली-नाली, शौचालय, बिजली और युवाओं के लिए रोजगार जैसे वादों को लागू करने का प्रयास किया गया। यह योजना ग्रामीण विकास की दिशा में एक बड़ा कदम मानी गई। नीतीश कुमार ने समय-समय पर अपनी राजनीतिक रणनीति बदली और कभी भारतीय जनता पार्टी तो कभी राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन कर सरकार चलाई। इस रणनीति ने उन्हें सत्ता में बनाए रखा, लेकिन साथ ही राजनीतिक आलोचनाओं को भी जन्म दिया।

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प्रशासनिक शैली और नेतृत्व

राजनीतिक विश्लेषक रवि अटल के मुताबिक, नीतीश कुमार की कार्यशैली को ‘माइक्रो मैनेजमेंट’ और ‘ग्राउंड अप्रोच’ के रूप में देखा जाता है। वे योजनाओं की निगरानी खुद करने के लिए जाने जाते हैं। उनकी छवि एक ऐसे नेता की रही है जो फाइलों से लेकर फील्ड तक हर स्तर पर सक्रिय रहते हैं। उन्होंने विकास, सामाजिक न्याय और कानून व्यवस्था को अपनी प्राथमिकताओं में रखा। उनकी कोशिश रही कि बिहार को पिछड़ेपन की छवि से बाहर निकाला जाए।

आलोचनाएं और राजनीतिक चुनौतियां

हर लंबे राजनीतिक सफर की तरह नीतीश कुमार के कार्यकाल में भी आलोचनाएं सामने आईं। बार-बार गठबंधन बदलने के कारण उन पर ‘पलटीमार राजनीति’ का आरोप लगा। शराबबंदी कानून के बावजूद अवैध शराब और क्रियान्वयन की समस्याएं बनी रहीं। रोजगार और उद्योग के क्षेत्र में अपेक्षित तेजी नहीं आने की शिकायतें उठती रहीं। विपक्ष के साथ-साथ कई बार सहयोगी दलों ने भी उनके फैसलों पर सवाल उठाए।

सड़क, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण में बड़े बदलाव

नीतीश कुमार की विरासत मिश्रित है, लेकिन प्रभावशाली भी। बिहार में सड़क, बिजली और बुनियादी ढांचे का विस्तार। शिक्षा और महिला सशक्तिकरण में बड़े सुधार। कानून-व्यवस्था में सुधार की कोशिश। ग्रामीण विकास को नई दिशा। उनकी नीतियों ने बिहार की छवि को काफी हद तक बदला। हालांकि चुनौतियां अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।

सुशासन की विरासत आगे बढ़ेगी या लौटेगा अस्थिरता का दौर?

नीतीश कुमार की राजनीति ने बिहार को विकास, सामाजिक न्याय और सुशासन का मिश्रण देने की कोशिश की। अब जब नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक सफर के इस अध्याय से कदम पीछे खींचा है तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार की अगली पीढ़ी उनका विजन आगे बढ़ा पाएगी? क्या सुशासन की यह विरासत मजबूत होकर आगे बढ़ेगी या राजनीति फिर पुराने अस्थिर दौर में लौटेगी? बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है, जहां नीतीश कुमार की विरासत और आने वाले नेतृत्व की क्षमता मिलकर राज्य की दिशा तय करेंगे।

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