– खादी और अहिंसा रेशम के परिधानों से दिखेगी भारतीयता बिहारशरीफ, 30 मार्च (हि.स.)। बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में मंगलवार को द्वितीय दीक्षांत समारोह का आयोजन होगा, जिसमें द्रौपदी मुर्मु मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी। वैभव सूर्यवंशी बने भारतीय टीम के लिए चुने जाने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी इस विशेष अवसर पर विश्वविद्यालय ने पारंपरिक दीक्षांत परिधानों में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए भारतीयता और पर्यावरणीय स्थिरता को प्राथमिकता दी है। औपनिवेशिक दौर के भारी मखमली गाउन की जगह इस बार विद्यार्थियों के लिए खादी के परिधान तैयार किए गए हैं, जबकि विशिष्ट अतिथियों और आगंतुकों के लिए अहिंसा रेशम (पीस सिल्क) से बने वस्त्र तैयार किए गए हैं। इसमें बिहार का प्रसिद्ध भागलपुरी रेशम भी शामिल है। अहिंसा रेशम को पर्यावरण-अनुकूल और क्रूरता-मुक्त कपड़ा माना जाता है, जिसमें रेशम के कीड़ों को बिना नुकसान पहुंचाए प्राकृतिक रूप से कोकून से बाहर आने दिया जाता है। यह हल्का, आरामदायक और स्थानीय जलवायु के अनुरूप होता है। यह पहल अकादमिक गरिमा को बनाए रखते हुए भारतीय परंपरा और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है। आयरलैंड और इंग्लैंड के खिलाफ टी-20 शृंखला के लिए भारतीय टीम घोषित, श्रेयस अय्यर बने कप्तान इन परिधानों का डिज़ाइन और रंग-संयोजन विश्वविद्यालय के “द नालंदा वे” दर्शन से प्रेरित है, जो मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व को दर्शाता है। विश्वविद्यालय का प्रतीक चिन्ह मानव आकृतियों से बना एक वृक्ष सतत विकास, ज्ञान-साझेदारी और विविधता में एकता का प्रतीक है। इस अवसर पर अतिथियों को दिए जाने वाले अंगवस्त्र बिहार के नपुरा और बसवन बिगहा के बुनकरों द्वारा तैयार किए गए हैं। साथ ही ‘बावन बूटी’ जैसी पारंपरिक बुनाई कला को भी प्रमुखता दी गई है, जो राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है। अंडर-18 एशिया कप : जापान को 4-1 से हराकर भारतीय पुरुष हॉकी टीम बनी चैंपियन यह पहल ‘सहभागिता’ कार्यक्रम के तहत स्थानीय महिला समूहों और कारीगरों के सहयोग से की गई है। इन प्रयासों के माध्यम से नालंदा विश्वविद्यालय अपनी दीक्षांत परंपरा को नया रूप देते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा, सतत विकास और सामुदायिक सहभागिता के मूल्यों को सशक्त रूप से प्रस्तुत कर रहा है।
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– खादी और अहिंसा रेशम के परिधानों से दिखेगी भारतीयता
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बिहारशरीफ, 30 मार्च (हि.स.)। बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में मंगलवार को द्वितीय दीक्षांत समारोह का आयोजन होगा, जिसमें द्रौपदी मुर्मु मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी।
इस विशेष अवसर पर विश्वविद्यालय ने पारंपरिक दीक्षांत परिधानों में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए भारतीयता और पर्यावरणीय स्थिरता को प्राथमिकता दी है। औपनिवेशिक दौर के भारी मखमली गाउन की जगह इस बार विद्यार्थियों के लिए खादी के परिधान तैयार किए गए हैं, जबकि विशिष्ट अतिथियों और आगंतुकों के लिए अहिंसा रेशम (पीस सिल्क) से बने वस्त्र तैयार किए गए हैं। इसमें बिहार का प्रसिद्ध भागलपुरी रेशम भी शामिल है।
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अहिंसा रेशम को पर्यावरण-अनुकूल और क्रूरता-मुक्त कपड़ा माना जाता है, जिसमें रेशम के कीड़ों को बिना नुकसान पहुंचाए प्राकृतिक रूप से कोकून से बाहर आने दिया जाता है। यह हल्का, आरामदायक और स्थानीय जलवायु के अनुरूप होता है। यह पहल अकादमिक गरिमा को बनाए रखते हुए भारतीय परंपरा और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है।
इन परिधानों का डिज़ाइन और रंग-संयोजन विश्वविद्यालय के “द नालंदा वे” दर्शन से प्रेरित है, जो मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व को दर्शाता है। विश्वविद्यालय का प्रतीक चिन्ह मानव आकृतियों से बना एक वृक्ष सतत विकास, ज्ञान-साझेदारी और विविधता में एकता का प्रतीक है।
इस अवसर पर अतिथियों को दिए जाने वाले अंगवस्त्र बिहार के नपुरा और बसवन बिगहा के बुनकरों द्वारा तैयार किए गए हैं। साथ ही ‘बावन बूटी’ जैसी पारंपरिक बुनाई कला को भी प्रमुखता दी गई है, जो राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।
यह पहल ‘सहभागिता’ कार्यक्रम के तहत स्थानीय महिला समूहों और कारीगरों के सहयोग से की गई है। इन प्रयासों के माध्यम से नालंदा विश्वविद्यालय अपनी दीक्षांत परंपरा को नया रूप देते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा, सतत विकास और सामुदायिक सहभागिता के मूल्यों को सशक्त रूप से प्रस्तुत कर रहा है।
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