Chhapra: आस्था, अनुशासन और लोक संस्कृति के अद्भुत संगम का प्रतीक चैती छठ महापर्व नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया। चार दिवसीय इस कठिन व्रत का समापन 25 मार्च को उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के साथ होगा। पर्व की शुरुआत होते ही पूरे जिले में भक्ति और श्रद्धा का माहौल बन गया है। छठ महापर्व, जिसे सूर्य उपासना का सबसे पवित्र पर्व माना जाता है, वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहला चैत्र माह में (चैती छठ) और दूसरा कार्तिक माह में। जिले में इस पर्व को लेकर व्रतियों और श्रद्धालुओं के बीच विशेष उत्साह देखा जा रहा है। घरों से लेकर घाटों तक साफ-सफाई और पूजा की तैयारियां जोरों पर हैं। वेनेजुएला भूकंप : भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ, ‘ऑपरेशन अमिस्ताद’ के तहत राहत सामग्री लेकर रवाना हुए वायुसेना के दो विमान ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस बार का चैती छठ कई शुभ संयोगों में संपन्न हो रहा है, जिससे इसकी धार्मिक महत्ता और बढ़ गई है। 22 मार्च को नहाय-खाय के दिन भरणी नक्षत्र और वैधृति योग का संयोग रहा। 23 मार्च को खरना के दिन कृत्तिका नक्षत्र के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। वहीं 24 मार्च को संध्या अर्घ्य के दिन रोहिणी नक्षत्र और प्रीति योग रहेगा, जबकि 25 मार्च को प्रातः अर्घ्य के समय मृगशिरा नक्षत्र और आयुष्मान योग का विशेष संयोग रहेगा। पर्व के दूसरे दिन यानी 23 मार्च को व्रती दिनभर निर्जला उपवास रखकर शाम में खरना पूजा करेंगे। इस दौरान गुड़ और चावल से बनी खीर का प्रसाद ग्रहण किया जाएगा। सद्दगुरु जग्गी वासुदेव पटना तीन दिवसीय दौरे पर पटना पहुंचे, मुख्यमंत्री ने किया स्वागत खरना के साथ ही 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाएगा, जो इस पर्व की सबसे कठिन साधना मानी जाती है। तीसरे दिन 24 मार्च को व्रती अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगे। इसके लिए घाटों पर विशेष व्यवस्था की जा रही है। प्रशासन द्वारा सुरक्षा, साफ-सफाई और रोशनी की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा का इस्तीफा चौथे और अंतिम दिन 25 मार्च की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर व्रती पारण करेंगे और इसके साथ ही यह महापर्व पूर्ण होगा। छठ महापर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत उदाहरण है। इसमें प्रकृति, सूर्य और जल के प्रति आभार प्रकट किया जाता है। लोकगीत, पारंपरिक वेशभूषा और सामूहिक सहभागिता इस पर्व को और भी विशेष बनाते हैं।
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Chhapra: आस्था, अनुशासन और लोक संस्कृति के अद्भुत संगम का प्रतीक चैती छठ महापर्व नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया। चार दिवसीय इस कठिन व्रत का समापन 25 मार्च को उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के साथ होगा। पर्व की शुरुआत होते ही पूरे जिले में भक्ति और श्रद्धा का माहौल बन गया है। छठ महापर्व, जिसे सूर्य उपासना का सबसे पवित्र पर्व माना जाता है, वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहला चैत्र माह में (चैती छठ) और दूसरा कार्तिक माह में। जिले में इस पर्व को लेकर व्रतियों और श्रद्धालुओं के बीच विशेष उत्साह देखा जा रहा है। घरों से लेकर घाटों तक साफ-सफाई और पूजा की तैयारियां जोरों पर हैं।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस बार का चैती छठ कई शुभ संयोगों में संपन्न हो रहा है, जिससे इसकी धार्मिक महत्ता और बढ़ गई है। 22 मार्च को नहाय-खाय के दिन भरणी नक्षत्र और वैधृति योग का संयोग रहा। 23 मार्च को खरना के दिन कृत्तिका नक्षत्र के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। वहीं 24 मार्च को संध्या अर्घ्य के दिन रोहिणी नक्षत्र और प्रीति योग रहेगा, जबकि 25 मार्च को प्रातः अर्घ्य के समय मृगशिरा नक्षत्र और आयुष्मान योग का विशेष संयोग रहेगा। पर्व के दूसरे दिन यानी 23 मार्च को व्रती दिनभर निर्जला उपवास रखकर शाम में खरना पूजा करेंगे। इस दौरान गुड़ और चावल से बनी खीर का प्रसाद ग्रहण किया जाएगा।
खरना के साथ ही 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाएगा, जो इस पर्व की सबसे कठिन साधना मानी जाती है। तीसरे दिन 24 मार्च को व्रती अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देंगे। इसके लिए घाटों पर विशेष व्यवस्था की जा रही है। प्रशासन द्वारा सुरक्षा, साफ-सफाई और रोशनी की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो।
चौथे और अंतिम दिन 25 मार्च की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर व्रती पारण करेंगे और इसके साथ ही यह महापर्व पूर्ण होगा। छठ महापर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत उदाहरण है। इसमें प्रकृति, सूर्य और जल के प्रति आभार प्रकट किया जाता है। लोकगीत, पारंपरिक वेशभूषा और सामूहिक सहभागिता इस पर्व को और भी विशेष बनाते हैं।
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