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बंगाल में थम गया पहले चरण के लिए चुनाव प्रचार का शोर, 23 अप्रैल को ईवीएम में कैद होगी 1478 उम्मीदवारों की किस्मत

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कोलकाता, 21 अप्रैल (हि.स.)। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण के लिए जोरदार और बहुचर्चित चुनाव प्रचार मंगलवार शाम छह बजे समाप्त हो गया। निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार प्रचार थमने के साथ ही अब सभी दलों की निगाह 23 अप्रैल को होने वाले मतदान पर टिक गई है। पहले चरण में राज्य की 152 विधानसभा सीटों पर वोट डाले जाएंगे। इन सीटों पर सभी दलों के कुल 1478 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं।

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यह चरण उत्तर बंगाल के कई जिलों के साथ दक्षिण बंगाल के अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों को भी कवर करता है। चुनावी सरगर्मी के अंतिम दिन राज्यभर में रैलियों, रोड शो, जनसभाओं और घर-घर संपर्क अभियान का सिलसिला जारी रहा।

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निर्वाचन आयोग के अनुसार पहले चरण में 3.60 करोड़ से अधिक मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इनमें लगभग 1.84 करोड़ पुरुष मतदाता, 1.75 करोड़ महिला मतदाता तथा 465 तृतीय लिंग मतदाता शामिल हैं। इतने बड़े स्तर पर मतदान को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष ढंग से संपन्न कराने के लिए आयोग ने अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था की है। राज्यभर में केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों की 2450 कंपनियां तैनात की गई हैं, जिनमें लगभग 2.5 लाख सुरक्षाकर्मी शामिल हैं।

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8000 मतदान केंद्र हैं अति संवेदनशीलआयोग ने पहले चरण के लिए 8000 से अधिक मतदान केंद्रों को अति संवेदनशील चिह्नित किया है। मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, कूचबिहार, बीरभूम और बर्धमान जिलों को विशेष रूप से संवेदनशील मानते हुए कड़ी निगरानी में रखा गया है। इन क्षेत्रों में केंद्रीय बलों के साथ निगरानी दल, विशेष पर्यवेक्षक और 2193 त्वरित प्रतिक्रिया दल तैनात किए गए हैं, ताकि किसी भी अप्रिय घटना की स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके।

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इस बार का चुनाव राज्य की सियासत के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार को हटाकर पहली बार अपने दम पर सत्ता में आने का दावा कर रही है। कांग्रेस और वाम दल भी कई क्षेत्रों में मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में जुटे हैं।

चुनाव प्रचार के दौरान इस बार सबसे बड़ा विवाद मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर रहा। इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद विपक्षी दलों, विशेषकर तृणमूल कांग्रेस, ने निर्वाचन आयोग पर गंभीर सवाल उठाए। पार्टी का आरोप है कि मुस्लिम बहुल मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में वैध मतदाताओं के नाम बड़ी संख्या में हटाए गए हैं। आयोग ने हालांकि इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि यह नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है और इसका उद्देश्य फर्जी, दोहराव वाले तथा अयोग्य नामों को हटाना है।

मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर मालदा के मोथाबाड़ी क्षेत्र में बड़ा विवाद भी सामने आया, जहां नाम कटने से नाराज लोगों ने पुनरीक्षण कार्य में लगे न्यायिक अधिकारियों का कई घंटों तक घेराव किया। इस घटना ने चुनावी माहौल को और गरमा दिया। बाद में इस मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंपे जाने का मुद्दा भी राजनीतिक बहस का केंद्र बना।

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चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में राजनीतिक हिंसा, कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति, भ्रष्टाचार, कट मनी, बेरोजगारी और घुसपैठ जैसे मुद्दों को जोरदार ढंग से उठाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने अनेक सभाओं में आरोप लगाया कि राज्य सरकार वोट बैंक की राजनीति के लिए अवैध घुसपैठ को बढ़ावा दे रही है, जिससे जनसंख्या संतुलन बदल रहा है। भाजपा ने समान नागरिक संहिता लागू करने, सीमाओं को मजबूत करने, राज्य कर्मचारियों को लंबित महंगाई भत्ता देने, महिलाओं को आर्थिक सहायता देने और रोजगार सृजन का वादा किया।

दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा पर केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग, मतदाता सूची में हस्तक्षेप और बाहरी नेताओं के सहारे चुनाव लड़ने का आरोप लगाया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी सभाओं में दावा किया कि भाजपा सत्ता में आई तो बंगाल की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को नुकसान होगा। तृणमूल कांग्रेस ने प्रत्येक परिवार को पक्का घर, पाइपलाइन से पेयजल, किसानों को सहायता, महिलाओं को बढ़ी हुई आर्थिक मदद और सामाजिक योजनाओं के विस्तार का वादा किया।

कांग्रेस और वाम दलों ने भी बेरोजगारी, शिक्षा संकट, उद्योगों के पलायन और किसानों की बदहाली को चुनावी मुद्दा बनाया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने भी राज्य में चुनाव प्रचार किया और भाजपा तथा तृणमूल दोनों पर हमला बोला।

कई हाई प्रोफाइल सीटों पर है मुकाबलापहले चरण में कई हाई प्रोफाइल सीटों पर मुकाबला होने जा रहा है। नंदीग्राम सीट सबसे अधिक चर्चा में है, जहां विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी मैदान में हैं। वर्ष 2021 में उन्होंने इसी सीट से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हराया था। इस बार भी नंदीग्राम पर पूरे राज्य की नजर है।

उत्तर बंगाल की दिनहाटा सीट पर तृणमूल के उदयन गुहा अपनी सीट बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भाजपा के प्रमुख नेता निसिथ प्रमाणिक को माथाभांगा सीट से उम्मीदवार बनाया गया है। सिलिगुड़ी सीट पर वरिष्ठ तृणमूल नेता गौतम देव मैदान में हैं। बहारमपुर सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी दो दशक से अधिक समय बाद विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। पश्चिम मेदिनीपुर की खड़गपुर सदर सीट से भाजपा के वरिष्ठ नेता दिलीप घोष भी चुनाव मैदान में हैं।

इसके अलावा मेखलीगंज, सितलकुची, दार्जिलिंग, रायगंज, इस्लामपुर, बालुरघाट, इंग्लिश बाजार और जंगीपुर जैसी सीटों पर भी कांटे की टक्कर मानी जा रही है। उत्तर बंगाल में गोरखालैंड की मांग, चाय बागान श्रमिकों का वेतन, सड़क और रेल ढांचे का विकास तथा सीमावर्ती इलाकों की समस्याएं प्रमुख मुद्दे रहे। वहीं मालदा और मुर्शिदाबाद में कृषि संकट, आम और रेशम उद्योग, रोजगार तथा मतदाता सूची विवाद ज्यादा चर्चा में रहे।

चुनाव प्रचार समाप्त होने के बाद अब उम्मीदवार घर-घर संपर्क और आंतरिक रणनीति पर ध्यान देंगे। निर्वाचन आयोग ने मतदान के दिन शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए सभी जिलों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। राज्यभर में सुरक्षा बलों का फ्लैग मार्च भी जारी है।

अब सबकी नजर 23 अप्रैल पर है, जब पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान होगा और करोड़ों मतदाता तय करेंगे कि पश्चिम बंगाल की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी। दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होगा, जबकि मतगणना 4 मई को की जाएगी।

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