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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का प्रांतीय अधिवेशन, शिक्षा और राष्ट्र पर विमर्श

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गोपालगंज, 03 जनवरी (हि.स.)। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) उत्तर बिहार का 67वां प्रांत अधिवेशन गोपालगंज में राष्ट्रवादी विचार, शैक्षणिक चिंतन और संगठनात्मक संवाद के साथ आगे बढ़ रहा है। मिंज स्टेडियम एवं सुशील मोदी सभागार परिसर में चल रहे इस तीन दिवसीय अधिवेशन के दूसरे दिन उद्घाटन सत्र के बाद बौद्धिक सत्रों में शिक्षा, मूल्यबोध और छात्र भविष्य को लेकर गंभीर मंथन हुआ।

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उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जेपी विश्वविद्यालय के कुलपति परमेंद्र कुमार बाजपेई ने की। मंच पर डॉ. विवेकानंद तिवारी, संदीप गिरी, डॉ. वीरेंद्र कुमार सोलंकी, मुकुल कुमार शर्मा और डॉ. अरविंद कुमार उपस्थित रहे। यह सत्र विचार और वैचारिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करने वाला रहा, जिसमें परिषद की ऐतिहासिक भूमिका और वर्तमान चुनौतियों पर चर्चा हुई।

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भारत की ज्ञान परंपरा और शिक्षा का संकट

डॉ. विवेकानंद तिवारी ने अपने संबोधन में कहा कि 9 जुलाई 1949 के बाद भारत ने एक बार फिर ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण की दिशा में कदम बढ़ाया, लेकिन समय के साथ शिक्षा का उद्देश्य सीमित होता चला गया। उन्होंने कहा कि भारत कभी विश्वगुरु रहा है, पर गुलामी के बाद हमारी शैक्षणिक चेतना कमजोर पड़ी। एबीवीपी इसी कमी को दूर करने के लिए ज्ञान, सेवा और राष्ट्र के भाव के साथ काम कर रही है।

उन्होंने परिषद के वैचारिक सूत्र “ज्ञान–शिव–एकता” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल नारा नहीं, बल्कि छात्र जीवन की दिशा तय करने वाला मंत्र है। परिषद के पूर्व प्रेरक यशवंतराव को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि संगठन की नींव एक शिल्पकार की तरह गढ़ी गई थी, जिसका प्रभाव आज भी दिखता है।

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कोविड काल के अभियान और छात्र संवाद

संदीप गिरी ने परिषद द्वारा चलाए गए अभियानों की चर्चा करते हुए कहा कि कोविड काल में जब छात्र परिसरों से दूर हो गए थे, तब ‘सेल्फी विद कैंपस’ और ‘परिषद चलो’ जैसे अभियानों ने छात्रों को संगठन से जोड़े रखा। उन्होंने कहा कि एबीवीपी शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्रों के भविष्य, उनके कर्तव्यबोध और सामाजिक जिम्मेदारी को लेकर भी सक्रिय भूमिका निभाती है।

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उन्होंने बताया कि मूल्यबोध में आ रही कमी को लेकर परिषद ने एक प्रस्ताव तैयार किया है, जिसे संबंधित स्तर पर भेजा गया है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि छात्र अपने कर्तव्यों और मूल्यों के प्रति कितने सजग हैं और उन्हें कैसे और सशक्त किया जा सकता है।

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सामाजिक असंतुलन और व्यवस्थित समाज की आवश्यकता

मुकुल कुमार शर्मा ने अपने संबोधन में सामाजिक असंतुलन की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि वर्ष 2004 में दिया गया नारा आज भी प्रासंगिक है, जिसमें क्षेत्रीय असमानताओं का उल्लेख था। उन्होंने कहा कि बीते दो दशकों में व्यवस्था निर्माण के प्रयास हुए हैं, लेकिन अब एक सुव्यवस्थित और संतुलित समाज की आवश्यकता है, जिसमें शिक्षा की भूमिका निर्णायक होगी।

बिहार की लोकतांत्रिक पहचान

वक्ताओं ने बिहार को संघर्ष और लोकतंत्र की भूमि बताते हुए कहा कि यहीं से लोकतांत्रिक चेतना की शुरुआत मानी जाती है। परिषद के प्रतिनिधियों ने कहा कि आज संगठन देशभर में लाखों कार्यकर्ताओं के साथ सक्रिय है और छात्रों में ‘जॉब ओरिएंटेड’ सोच के बजाय ‘सर्विस ओरिएंटेड’ दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास कर रहा है।

शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन संभव

प्रोफेसर पी.के. वाजपेई ने कहा कि उन्होंने अपने शोध में यह पाया है कि शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन संभव है। उन्होंने कहा कि ऐसा छात्र तैयार करना आवश्यक है जो अर्थशास्त्र और विज्ञान को समझने के साथ-साथ देश के मूल्यों को भी आत्मसात करे। उन्होंने आरएसएस द्वारा दिए गए पांच मंत्रों और एबीवीपी के ‘विजन पंच परिवर्तन’ का उल्लेख करते हुए बताया कि समरसता, कुटुंबकम की भावना, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों पर संगठन निरंतर कार्य कर रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि विज्ञान के विकास के साथ उसके दुरुपयोग की संभावना बढ़ती है, जिसे नियंत्रित करने की क्षमता छात्रों में तभी आएगी जब वे अपने मूल्यों के प्रति सजग होंगे। धर्म का अर्थ किसी पंथ से नहीं, बल्कि कर्तव्य पालन से जुड़ा होना चाहिए।

जनप्रतिनिधि और शिक्षाविद रहे मौजूद

कार्यक्रम में गोपालगंज के विधायक सुभाष सिंह, बैकुंठपुर के विधायक मिथिलेश तिवारी, एमएलसी पप्पू सिंह, विनोद सिंह, प्रोफेसर डॉ. ए.के. पांडे, डॉ. अभिषेक रंजन, सूर्यदेव, धर्मेंद्र सिंह, रवि प्रकाश मणि त्रिपाठी, सुजीत पासवान, राकेश भारती, चंदन मोहन पांडे, राजू चौबे, चंचल, उमेश प्रधान, राजेश बरनावली, राजीव कुमार और गप्पू जी उर्फ गप्पू सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और गणमान्य लोग उपस्थित रहे।उद्घाटन सत्र के अंत में संदीप गिरी ने आभार व्यक्त करते हुए सत्र की समाप्ति की घोषणा की।

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