नई दिल्ली, 12 फरवरी (हि.स.)। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने केंद्र सरकार की हाल की वंदे मातरम के पाठ को लेकर जारी की गई अधिसूचना पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे वापस लेने की मांग की है।
सरकार की अधिसूचना में सरकारी समारोहों और स्कूलों में राष्ट्रगान जन गण मन से पहले वंदे मातरम के सभी छंद का पाठ अनिवार्य कर दिया गया है। बोर्ड ने इस फैसले को असंवैधानिक और धार्मिक स्वतंत्रता के विपरीत बताया है।
बोर्ड के महासचिव मौलाना मोहम्मद फजलुर्रहीम मुजदद्दी ने सरकार के निर्णय को असंवैधानिक, धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के विरुद्ध, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विपरीत तथा मुसलमानों की धार्मिक मान्यताओं के सीधे विरोधाभासी बताया। उन्होंने कहा कि इसलिए यह निर्णय मुसलमानों के लिए पूरी तरह से अस्वीकार्य है।
मौलाना ने कहा कि रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह और संविधान सभा में विचार-विमर्श के बाद यह सहमति बनी थी कि वंदे मातरम के केवल पहले दो छंदों का ही प्रयोग किया जाएगा। एक धर्मनिरपेक्ष सरकार एक धर्म की मान्यताओं या शिक्षाओं को अन्य धर्मों के अनुयायियों पर जबरन नहीं थोप सकती। यह गीत बंगाल के संदर्भ में लिखा गया है और इसमें दुर्गा तथा अन्य देवताओं की पूजा और आदर का उल्लेख है। पश्चिम बंगाल के चुनावों से पहले इस फैसले को लागू करने के पीछे चाहे जो भी राजनीतिक विचार हों, मुसलमान इसे स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि यह सीधे तौर पर उनके विश्वास के विपरीत है।
उन्होंने कहा कि मुसलमान केवल एक ईश्वर यानी अल्लाह की पूजा करता है और इस्लाम ईश्वर के साथ किसी को भी जोड़ने की अनुमति नहीं देता है।
बोर्ड महासचिव ने कहा कि भारतीय अदालतों ने भी माना है कि अन्य छंद धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के अनुरूप नहीं हैं तथा उनके पाठ पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसलिए बोर्ड मांग करता है कि केंद्र सरकार अधिसूचना को तुरंत वापस ले; अन्यथा बोर्ड इसे अदालत में चुनौती देगा।








