मुंबई, 08 अक्टूबर (हि.स.) । दिग्गज भारतीय अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार सुबह 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया। गोवा स्थित अपने आवास पर उन्हें गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया, जिसके बाद तत्काल अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों और करीब 45 मिनट तक चले सीपीआर के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन की खबर की पुष्टि उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने की है।
मुंबई की फिल्मी दुनिया में कई कलाकार आए और अपनी पहचान बनाई, लेकिन कुछ कलाकार ऐसे रहे जिनकी अदाकारी ने पर्दे पर किरदारों को जीवंत कर दिया। नाना पाटेकर उन्हीं चुनिंदा अभिनेताओं में शामिल रहे। उनका असली नाम विश्वनाथ दिनकर पाटेकर था। 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे नाना पाटेकर ने अभिनय के क्षेत्र में अपनी अलग और बेहद प्रभावशाली पहचान बनाई। वे अभिनेता होने के साथ-साथ लेखक, निर्देशक और समाजसेवी के रूप में भी सक्रिय रहे।
नाना पाटेकर का जन्म एक मराठी परिवार में हुआ। उनके पिता गजानन (दिनकर) पाटेकर टेक्सटाइल पेंटर और व्यवसायी थे, जबकि मां निर्मला पाटेकर गृहिणी थीं। नाना ने मुंबई में पढ़ाई की और सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से कमर्शियल आर्ट की शिक्षा हासिल की। पढ़ाई के साथ ही उनका झुकाव कला और अभिनय की ओर बढ़ने लगा था।
फिल्मों में आने से पहले नाना ने बतौर कमर्शियल आर्टिस्ट काम किया। आर्थिक संघर्ष के दौर में उन्होंने विज्ञापन एजेंसी में काम करने के साथ फिल्मों के पोस्टर बनाने और दूसरे छोटे-मोटे काम भी किए। एक समय ऐसा भी था जब उन्हें अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता था। बाद में रंगमंच उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। नाना ने स्वयं कई मौकों पर बताया कि थिएटर ने उन्हें अभिनय की बारीकियां सीखने और खुद को कलाकार के तौर पर मजबूत बनाने में मदद की।
नाना पाटेकर ने फिल्मों से पहले रंगमंच पर अपनी पहचान बनाई। थियेटर में लंबे समय तक काम करने के बाद उन्हें फिल्मों में आने का मौका मिला। वर्ष 1978 की फिल्म ‘गमन’ से उन्होंने हिंदी सिनेमा में कदम रखा। इस फिल्म में उनके साथ स्मिता पाटिल भी थीं। नाना के अनुसार, फिल्मों में आने के लिए स्मिता पाटिल ने भी उन्हें प्रोत्साहित किया था। इसके बाद उन्होंने ‘सलाम बॉम्बे!’ जैसी फिल्मों में काम किया। हालांकि उन्हें वास्तविक पहचान 1989 की फिल्म ‘परिंदा’ से मिली। फिल्म में उनके खतरनाक और प्रभावशाली अभिनय ने दर्शकों और समीक्षकों दोनों का ध्यान खींचा। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
राष्ट्रीय पुरस्कारों का अनोखा रिकॉर्ड
नाना पाटेकर उन चुनिंदा अभिनेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते। 1990 में ‘परिंदा’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके बाद 1995 में ‘क्रांतिवीर’ के लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। ‘क्रांतिवीर’ में प्रताप नारायण तिलक का उनका किरदार आज भी हिंदी सिनेमा के यादगार पात्रों में गिना जाता है। 1997 में ‘अग्निसाक्षी’ के लिए नाना को एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इस तरह उन्होंने अभिनय की तीन अलग-अलग भूमिकाओं के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा साबित की।
अभिनेता से निर्देशक तक
नाना पाटेकर ने सिर्फ अभिनय तक खुद को सीमित नहीं रखा। वर्ष 1991 में उन्होंने फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का निर्देशन किया। फिल्म में उन्होंने अभिनय भी किया। सेना की पृष्ठभूमि और देशभक्ति से जुड़े विषय पर बनी इस फिल्म को उनकी गंभीर और यथार्थवादी शैली के लिए सराहा गया। इसके बाद उन्होंने ‘अंगार’, ‘तिरंगा’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘यशवंत’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’ और ‘राजनीति’ जैसी फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। खलनायक से लेकर पुलिस अधिकारी, राजनेता और आम आदमी तक, उन्होंने लगभग हर तरह के किरदार में अपनी छाप छोड़ी। ‘अंगार’ और ‘अपहरण’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार भी मिला।
कॉमेडी में भी दिखाया दम
नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ गंभीर और आक्रामक किरदारों तक सीमित नहीं रही। 2007 की फिल्म ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी के किरदार ने उनके अभिनय का एक बिल्कुल अलग रूप दर्शकों के सामने रखा। उनके संवाद बोलने का अंदाज, गुस्सा और हास्य का मेल दर्शकों को खूब पसंद आया। बाद में ‘वेलकम बैक’ में भी उन्होंने यही किरदार निभाया। मराठी सिनेमा में भी नाना ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। 2016 की फिल्म ‘नटसम्राट’ में गणपतराव बेलवलकर की भूमिका को उनके करियर की सबसे शानदार प्रस्तुतियों में गिना जाता है। इस भूमिका के लिए उन्हें फिल्मफेयर मराठी में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला।
पद्मश्री सम्मान
भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए सरकार ने वर्ष 2013 में नाना पाटेकर को पद्मश्री से सम्मानित किया। आधिकारिक पद्म पुरस्कार रिकॉर्ड में उनका नाम ‘श्री विश्वनाथ दिनकर पाटेकर उर्फ नाना पाटेकर’ के रूप में कला क्षेत्र में दर्ज है। नाना पाटेकर का जीवन संघर्ष, अनुशासन और अभिनय के प्रति समर्पण की कहानी रहा। उन्होंने छोटे-मोटे कामों से शुरुआत की, थियेटर में अपनी कला को निखारा और फिर हिंदी तथा मराठी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में अपनी जगह बनाई। उनकी खासियत यह रही कि वे सिर्फ संवाद नहीं बोलते थे, बल्कि अपनी आवाज, चेहरे के भाव और शरीर की भाषा से किरदार को जीवंत कर देते थे। यही वजह है कि नाना पाटेकर का नाम भारतीय सिनेमा के उन कलाकारों में हमेशा याद किया जाएगा, जिन्होंने अभिनय को सिर्फ पेशा नहीं बल्कि कला के रूप में जिया।


















