डाॅ.अरविंद नाथ तिवारी
भारतीय राजनीति में जाति, आरक्षण और सामाजिक न्याय का प्रश्न कोई नया नहीं है। आजादी के बाद से ही सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए संविधान ने विशेष प्रावधान किए। समय के साथ आरक्षण केवल सामाजिक प्रतिनिधित्व का माध्यम नहीं रहा, बल्कि वह भारतीय चुनावी राजनीति का एक प्रभावशाली हथियार भी बन गया। आज स्थिति यह है कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों दल सामाजिक न्याय, संविधान और आरक्षण के सवालों को अपने-अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं। इससे समाज का एक बड़ा वर्ग स्वयं को राजनीतिक रूप से ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
हाल में राहुल गांधी द्वारा एक दलित नेता के कार्यक्रम के बाद कथित रूप से स्थान के शुद्धिकरण को लेकर दिया गया बयान इसी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। उनका कहना था कि यदि किसी व्यक्ति की जाति के आधार पर किसी स्थान का शुद्धिकरण किया गया है तो यह छुआछूत की मानसिकता को दर्शाता है और इस पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। इसी बयान को लेकर हल्द्वानी कोतवाली में अमित कुमार द्वारा शिकायत किए जाने और पुलिस द्वारा प्राथमिकी दर्ज किए जाने की बात सामने आई है। शिकायतकर्ता ने स्वयं को अनुसूचित जाति समुदाय से बताते हुए आरोप लगाया है कि राहुल गांधी ने पूरे तथ्य जाने बिना सफाई की सामान्य प्रक्रिया को जातिगत भेदभाव से जोड़ दिया।
यह मामला केवल एक राजनीतिक बयान या प्राथमिकी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भारतीय राजनीति में जाति की लगातार बढ़ती भूमिका का बड़ा प्रश्न छिपा हुआ है। यदि वास्तव में किसी व्यक्ति को उसकी जाति के कारण अपमानित किया गया है तो निश्चित रूप से कानून को अपना काम करना चाहिए। लेकिन दूसरी ओर, किसी सामान्य प्रशासनिक, धार्मिक अथवा सामाजिक प्रक्रिया को बिना पर्याप्त तथ्य के जातिगत भेदभाव का नाम देना भी गंभीर विषय है। सामाजिक न्याय की लड़ाई तभी मजबूत होगी जब आरोप तथ्य और प्रमाण पर आधारित हों, न कि राजनीतिक सुविधा पर।
इसी बीच विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियम और आर्थिक आधार पर आरक्षण सहित विभिन्न मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों के बाद केंद्रीय नेताओं के बयानों ने आरक्षण की राजनीति को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। राजनाथ सिंह, अमित शाह और चिराग पासवान जैसे नेताओं के बयानों को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हुई है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सत्ता और विपक्ष भारतीय समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं?
विपक्ष पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वह संविधान, मनुस्मृति और छुआछूत जैसे मुद्दों को राजनीतिक हथियार बनाकर दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद करना चाहती है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष पर भी आरोप है कि वह आरक्षण और संविधान की राजनीति के माध्यम से विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच अपना चुनावी आधार मजबूत करने का प्रयास करती है। यदि दोनों पक्षों की राजनीति का केंद्र केवल चुनावी गणित बन जाय तो सामाजिक न्याय का मूल उद्देश्य पीछे छूट सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य को स्पष्ट करना भी आवश्यक है। भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व संबंधी आरक्षण की प्रारंभिक अवधि दस वर्ष निर्धारित की गई थी, लेकिन संसद ने संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से इसे लगातार आगे बढ़ाया है। इसलिए यह कहना कि भारत में हर प्रकार का आरक्षण केवल दस वर्ष के लिए था ।
आरक्षण का मूल उद्देश्य उन समुदायों को अवसर देना था जिन्हें सदियों तक सामाजिक भेदभाव और अवसरों की असमानता का सामना करना पड़ा, यह उद्देश्य आज भी महत्वपूर्ण है। लेकिन सात दशक से अधिक समय बाद यह सवाल पूछना भी लोकतांत्रिक अधिकार है कि आरक्षण व्यवस्था का लाभ सबसे अधिक जरूरतमंद व्यक्ति तक किस प्रकार पहुंचे। क्या लाभ एक सीमित वर्ग तक ही केंद्रित हो रहा है? क्या आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन आरक्षण के दायरे से बाहर रहने वाले परिवारों के लिए पर्याप्त अवसर हैं? क्या शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिससे किसी व्यक्ति को केवल जाति के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर भी सहायता मिले?
आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग इसी व्यापक बहस का हिस्सा है। देश में अनेक लोग मानते हैं कि गरीबी किसी जाति, धर्म या समुदाय की सीमा नहीं देखती। गरीब परिवार चाहे किसी भी सामाजिक समूह से हो, उसके बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक जीवन का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी समझना होगा कि सामाजिक भेदभाव और आर्थिक पिछड़ापन एक ही समस्या नहीं हैं। आर्थिक सहायता सामाजिक भेदभाव की समस्या को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती। इसलिए सामाजिक और आर्थिक दोनों पहलुओं को ध्यान में रखकर नीति बनाने की आवश्यकता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि चुनाव आते ही राजनीतिक दल समाज को अलग-अलग पहचान के आधार पर देखने लगते हैं। कभी जातीय जनगणना और सामाजिक हिस्सेदारी के नाम पर राजनीतिक ध्रुवीकरण किया जाता है। सवाल यह है कि समाज को बांटने वाली राजनीति चाहे सत्ता पक्ष करे या विपक्ष, उसका अंतिम नुकसान किसे होता है? नुकसान आम नागरिक का ही होता है।
बहुसंख्यक समाज में भी आज यह भावना मजबूत हो रही है कि राजनीतिक दल उनकी वास्तविक समस्याओं से अधिक चुनावी समीकरणों को महत्व देते हैं। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की आय, छोटे व्यापारियों की कठिनाइयां, युवाओं का भविष्य और कानून-व्यवस्था जैसे प्रश्न पीछे चले जाते हैं और चुनावी मंच पर जाति तथा धार्मिक पहचान प्रमुख हो जाती है।
हालांकि ‘बहुसंख्यक हिन्दू’ को एक समान राजनीतिक या सामाजिक समूह मान लेना भी उचित नहीं होगा। हिन्दू समाज के भीतर स्वयं जाति, क्षेत्र, भाषा, आर्थिक स्थिति और सामाजिक अनुभवों की बड़ी विविधता है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल को यह दावा नहीं करना चाहिए कि वह पूरे समाज की एकमात्र आवाज है। लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक की समस्याओं और अधिकारों को समान महत्व मिलना चाहिए।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)



















