नई दिल्ली, 24 मार्च (हि.स.)। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म को अपनाने वाले ही अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं। ईसाई या किसी दूसरे धर्म को अपनाने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं मिलेगा। जस्टिस पीके मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने साफ कहा कि ईसाई धर्म अपनाने वाले दलित को एससी-एसटी एक्ट का लाभ नहीं मिलेगा। श्री मोती सिंह जागेश्वरी आयुर्वेद कॉलेज में निःशुल्क चिकित्सा शिविर, 200 मरीजों की हुई जांच उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मई 2025 के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें कहा गया था कि जो व्यक्ति ईसाई धर्म अपना चुका है और सक्रिय रुप से उसका पालन करता है, वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रह सकता है। आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले को पादरी चिंथदा ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी। पीएम सूर्य घर योजना के लाभ, सब्सिडी, ऋण सुविधा एवं ऊर्जा आत्मनिर्भरता पर दी गई जानकारी पादरी चिंथदा ने आरोप लगाया था कि उन्हें अक्काला रामिरेड्डी और अन्य लोगों की ओर से जातिगत भेदभाव किया गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने एससी-एसटी एक्ट के तहत उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी। इसी एफआईआर को निरस्त करने के लिए याचिकाकर्ता ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख किया था। भरत भूषण तिवारी मुठभेड़ मामले में चार पुलिस अधिकारियों ने न्यायिक जांच आयोग के समक्ष दर्ज कराया बयान उच्च न्यायालय ने एफआईआर इस आधार पर निरस्त कर दी थी कि पादरी ने ईसाई धर्म परिवर्तन के बाद अपने एससी वाले स्टेटस को खो दिया। इसलिए वो एससी-एसटी एक्ट के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकते। उच्च न्यायालय के इसी आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थी।
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नई दिल्ली, 24 मार्च (हि.स.)। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म को अपनाने वाले ही अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं। ईसाई या किसी दूसरे धर्म को अपनाने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं मिलेगा। जस्टिस पीके मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने साफ कहा कि ईसाई धर्म अपनाने वाले दलित को एससी-एसटी एक्ट का लाभ नहीं मिलेगा।
उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मई 2025 के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें कहा गया था कि जो व्यक्ति ईसाई धर्म अपना चुका है और सक्रिय रुप से उसका पालन करता है, वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रह सकता है। आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले को पादरी चिंथदा ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी।
पादरी चिंथदा ने आरोप लगाया था कि उन्हें अक्काला रामिरेड्डी और अन्य लोगों की ओर से जातिगत भेदभाव किया गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने एससी-एसटी एक्ट के तहत उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी। इसी एफआईआर को निरस्त करने के लिए याचिकाकर्ता ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख किया था।
उच्च न्यायालय ने एफआईआर इस आधार पर निरस्त कर दी थी कि पादरी ने ईसाई धर्म परिवर्तन के बाद अपने एससी वाले स्टेटस को खो दिया। इसलिए वो एससी-एसटी एक्ट के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकते। उच्च न्यायालय के इसी आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थी।
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