Chhapra: सुहागिन महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह व्रत पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है। इस अवसर पर महिलाएं विधि-विधान से वट वृक्ष की पूजा कर सावित्री और सत्यवान की कथा का श्रवण करती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सावित्री ने अपने पतिव्रत धर्म और दृढ़ संकल्प के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से वट सावित्री व्रत को अटल प्रेम, समर्पण और नारी शक्ति के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
वट सावित्री व्रत के अवसर पर आज सुहागिन महिलाओं ने वट वृक्ष के नीचे पूजा-अर्चना कर कच्चे सूत को वृक्ष के चारों ओर लपेटते हुए परिक्रमा किया। साथ ही पूजा के दौरान फल, फूल, अक्षत, सिंदूर और मिठाई अर्पित किया। कई स्थानों पर महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से व्रत कथा का आयोजन भी किया गया।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह देखा जा रहा है। मंदिरों और वट वृक्षों के आसपास सुबह से ही श्रद्धालु महिलाओं की आवाजाही बनी रही।
ज्योतिषाचार्य संजीत कुमार मिश्रा के अनुसार, वट वृक्ष को त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। इस वृक्ष की पूजा से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में दांपत्य जीवन के विश्वास, प्रेम और समर्पण का भी प्रतीक माना जाता है।

















