Chhapra: सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव के प्रत्याशी डॉ. राहुल राज ने शनिवार को पत्रकार वार्ता कर अपनी जीत का दावा किया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजा का बेटा राजा नहीं होता, बल्कि जनता अपने विवेक से प्रतिनिधि चुनती है। शिक्षक समाज भी वंशवाद और राजनीतिक प्रभाव से ऊपर उठकर अपने संघर्ष के साथी को प्रतिनिधित्व देगा।
डॉ. राहुल राज ने कहा कि उन्होंने पिछले 15 वर्षों से पार्टी की सेवा की है और पिछले तीन-चार वर्षों से शिक्षकों के हक, सम्मान एवं न्यायसंगत मांगों के लिए सड़क से सचिवालय तक संघर्ष किया है। उन्होंने चुनाव प्रचार में मंत्रियों की असाधारण सक्रियता पर सवाल उठाते हुए कहा कि बिहार में आठ सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, लेकिन सारण में जिस तरह मंत्रियों और नेताओं की पूरी फौज उतारी गई है, वह कई सवाल खड़े करती है।
उन्होंने कहा कि शिक्षक राजनीतिक दबाव या कथित धमकियों से प्रभावित होने वाले नहीं हैं, बल्कि अपने विवेक से निर्णय लेंगे। उन्होंने पत्रकार वार्ता के दौरान उन्होंने कहा कि मंत्री किसी एक प्रत्याशी के नहीं, बल्कि सभी शिक्षकों के होते हैं। किसी खास प्रत्याशी को जिताने वालों का ही काम करने और दूसरों की उपेक्षा करने जैसी कथित सोच लोकतांत्रिक भावना के विपरीत है। शिक्षकों को ऐसा प्रतिनिधि चाहिए, जो उनके बीच रहा हो, उनकी समस्याओं को समझता हो और उनके अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाता हो।
उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी पर निशाना साधते हुए कहा कि वर्षों से संघर्ष करने वाले और चुनाव से महज एक महीने पहले सक्रिय होने वाले प्रत्याशी के प्रयासों की तुलना नहीं की जा सकती। डॉ. राहुल राज ने सरकार से सातवें वेतनमान की लंबित मांग पर तत्काल बैठक कर निर्णय लेने की अपील की।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार शिक्षकों की इस मांग को पूरा कर देती है, तो वह अपने संघर्ष की सफलता मानेंगे और उम्मीदवारी वापस लेने पर भी विचार कर सकते हैं। वित्त रहित शिक्षकों के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि अनुदान के बदले वेतनमान की घोषणा से शिक्षकों में निराशा है और उनकी मांगें केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
उन्होंने शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त कर शिक्षण कार्य पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर देने की मांग भी उठाई। उन्होंने कहा कि शिक्षक समाज की समस्याओं का समाधान और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना उनकी प्राथमिकता है।
डॉ. राहुल राज ने कहा कि शिक्षकों से संवाद के दौरान उन्हें लगातार समर्थन मिल रहा है। कई शिक्षक कैमरे के सामने अपनी राय रखने में संकोच करते हैं, लेकिन व्यक्तिगत बातचीत में अपनी समस्याएं और पसंद स्पष्ट करते हैं।
उन्होंने विश्वास जताया कि 23 अक्टूबर को शिक्षक अपने मताधिकार से संघर्ष, सम्मान और अधिकारों की लड़ाई का जवाब देंगे।



















