सारण की 5 बेटियां, जो 2018 में समाज के लिए बनी मिसाल

सारण की 5 बेटियां, जो 2018 में समाज के लिए बनी मिसाल

Chhapra(Aman Kumar): वर्ष 2018 को सारण के लिए यहाँ की बेटियों ने काफी खास बना दिया. 2018 में सारण की बेटियां ने शिक्षा से लेकर समाज सेवा, खेल समेत हर क्षेत्र में देश भर में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. इन बेटियों ने राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सारण को गौरवान्वित ही नहीं किया बल्कि समाज की सोच को भी बदलने का कार्य किया है.

आज हम सारण की उन 5 बेटियों के बारे में बता रहे हैं. जिन्होंने 2018 में सारण के लिए एक मिसाल पेश की.

सविता महतो

देश मे 100 प्रभावशाली महिलाओं में सविता को मिला स्थान
सारण की सविता ने वह कर दिखाया जो एक आम इंसान के लिए करना काफी मुश्किल है. जिले के पानापुर में जन्मी सविता महतो को 2018 में देश की 100 सबसे प्रभावशाली महिलाओं में 10वां स्थान मिला था. सविता ने पानापुर से साइकिल की सवारी करते हुए महिला सुरक्षा और बेटी बचाओ का प्रचार प्रसार करने के लिए पूरे देश में साइकिल यात्रा पर निकली थी. उन्होंने अपनी इस यात्रा में महिला सशक्तिकरण, बेटी बचाव आदि के संदेश दिए. ज़िले के पानापुर निवासी चौहान महतो की पुत्री सविता ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उन्होंने देश के 29 राज्यों में 12, 500 किलोमीटर का सफर तय किया था. जिसके बाद उन्हें वोमेन इनोवेटर नाम की संस्था ने देश की 100 सबसे प्रभावशाली महिलाओं में शामिल किया था.

रौशनी बनी डेनमार्क की राजदूत

रौशनी

2018 में सारण के लिए एक बड़ी उपलब्धि साबित हुई. मढौरा प्रखण्ड की आटा गांव निवासी रौशनी को इसी वर्ष 11 अक्टूबर को इंटरनेशनल डे ऑफ गर्ल चाइल्ड के दिन एक दिन के लिए डेनमार्क का राजदूत बनाया गया था. रौशनी काफी सालो से सारण में समाजिक कार्यों के लिए जानी जाती रही हैं. उन्होंने छपरा में गर्ल और चाइल्ड एजुकेशन को लेकर कई सराहनीय कार्य किये हैं. रौशनी को पूरे भारत में उन 16 लड़कियों में स्थान मिला जिन्हें 11 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस के मौके पर नयी दिल्ली अलग अलग देशों का राजदूत बनाया गया. एक बेटी के इस मुकाम पर पहुँचने से पूरा सारण गौरवान्वित महसूस कर रहा है. वे पढ़ाई के साथ साथ विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से जुड़ी है. इसके तहत वे फेस ऑफ फ्यूचर इंडिया, राष्ट्रीय सेवा योजना के साथ प्लान इंडिया की भी सक्रिय कार्यकर्ता हैं. जिसमें वो जिले भर में विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों में अपना योगदान देती हैं. 

बिहार फुटबॉल टीम की गोलकीपर बनी संध्या

संध्या कुमारी

बेटियों ने अपनी मेहनत और लगन ने भी साल 2018 को सारण के किए बेहद खास बनाया है. शहर के साढ़ा मुहल्ले की रहने वाली संध्या कुमारी तमाम मुश्किलों को पार करती हुई इसी वर्ष बिहार के फुटबॉल टीम की गोलकीपर बनकर एक नया मुकाम हासिल किया. एक से छोटे शहर में जहां फुटबॉल जैसे खेल को कैरियर बनाने के बारे में सोंचना दूर की बात है, वहां संध्या का संघर्ष उन्हें बिहार का गोल कीपर बना गया. संध्या शुरुआत में सहेलियों के साथ फुटबाल खेला करती थी. धीरे धीरे वक्त बीत तो सफलता भी मिली. संध्या के पिता ललन मांझी पिता ललन मांझी एक राजमिस्त्री हैं. दो वक्त की रोटी, अच्छे कपड़े और शिक्षा जैसी जरूरतों के बीच सफलता जैसे शब्द इस परिवार से कोसो दूर थे. लेकिन संध्या ने इन सब मुश्किलों हालात का सामना करते हुए खेल में बिहार की बेटियों के लिए प्रेरणा बन गयी हैं.

सामाजिक कार्यों में रचना हैं अव्वल

रचना पर्वत

जब बात बेटियों की हो रही है तो छपरा की रचना पर्वत का भी नाम आता है. रचना पर्वत पूरे जिले में रक्त वीरांगना के रूप में जानी जाती हैं. समाज सेवा से जुड़कर इन्होंने अब तक कई लोगों को लिए रक्तदान कर उनकी की जान बचाई है. समाज सेवा के क्षेत्र में इन्हें अचीवर्स अवार्ड भी मिल चुका है. रचना FFI से जुड़के फ्री एजुकेशन, नारी सशक्तिकरण पर भी काफी सालों से कार्य कर रही हैं. रचना का यह प्रयास समाज में बदलाव ला रहा है. रचना के रक्तदान से प्रेरित होकर सारण की लड़कियों ने भी इस रक्तदान मुहिम से खुद को जोड़ लिया. जिले में कहीं भी किसी को आपातकाल में रक्त की आवश्यकता होती है. शहर के नगर पालिका चौक निवासी रामानंद पर्वत के 24 वर्षीय पुत्री रचना पूर्व में राष्ट्रीय स्तर की वेटलिफ्टर खिलाड़ी रही हैं. उन्होंने 7 बार बिहार में बेस्ट वेटलिफ्टर का खिताब जीता है.

 

2 सालों से बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे रहीं सुनीता

सुनीता कुमारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि बेटियां होंगी तभी समाज बनेगा, कहावत भी है कि एक बेटी को साक्षर करना पूरे समाज को साक्षर करने जैसा है. सारण जिले के मढौरा प्रखंड के सिसवा रसूलपुर गांव में सुनीता पिछले 2 सालों से गरीब बस्ती में निशुल्क शिक्षा देते आ रही हैं. वह गरीब बस्ती के बच्चों को हर रोज 2 घण्टे पढ़ाती हैं. जिसमें सुनीता के पास पहली से सातवीं कक्षा के बच्चे और बच्चियों को पढ़ाती हैं. हर दिन सुनीता के पास पढ़ने के लिए 50 बच्चे आते हैं. 20 वर्षीय सुनीता के इस प्रयास से लोगों ने भी काफी सराहा. कल तक जो बच्चे पैसों से आभाव में पढ़ नहीं पाते थे वो बच्चे आज सुनीता के यहां आकर निशुल्क शिक्षा ग्रहण करते हैं. सुनीता स्नातक पार्ट वन की छात्रा भी हैं. इसके अलावें वो वहीं गांव के एक प्राइवेट स्कूल में भी पढ़ाती हैं. स्कूल से छुट्टी होने के बाद जो समय को मिलता है वह गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए समय निकालती है.

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