कविता: मुझे किसी भी हिस्से की जरूरत ही नहीं, मेरे हिस्से में माँ मिली है

कविता: मुझे किसी भी हिस्से की जरूरत ही नहीं, मेरे हिस्से में माँ मिली है

खुशनसीब है जो तुझे मां मिली है,
तेरी ज़िन्दगी को नई, पहचान मिली है।
भूल कर भी ना करना, रुसवा उसको कभी।
देख तुझे मां नहीं, तुझको भगवान मिली है।।

रोशनी को भी कर दे जो ज्यादा रौशन,
तेरे घर को ऐसी रोशनदान मिली है।
बेकार के उन रिश्तों में, यूं उलझा ना कर
तुझे रिश्ता क्या, पूरा खानदान मिली है।।

क्यूं रुलाता है तू बार बार उसे,
क्यूं सताता है तू बार बार उसे,
खुदा से देख, यूं बगावत ना कर,
उसके बरकत से ही तुझको, तो मां मिली है।।

अपने हिस्से की किस्मत, क्यूं बेच आये बाज़ार में,
शायद दौलतें तुझको, तमाम मिली है।
फिर भी दौड़ पड़े हो, अपने हिस्से की खुशियां लुटाने,
क्या खुशियों की कोई, नई दुकान मिली है।

मुझे किसी भी हिस्से की जरूरत ही नहीं,
क्यूंकि मुझे मेरे हिस्से में, मां मिली है।।
सबको सबके हिस्से का, मिल गया सब कुछ
पर कुछ ना कुछ सबको और चाहिए।
अरे! किसी रोते हुए बच्चे से पूछो कभी,
उसे कुछ नही, बस उसकी मां चाहिए।।।।।

{ये लेखक के निजी विचार है} 

 

Name: Prakhar
Address: Prabhunath nagar,tari
Occupation: Student (B.Sc )

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