योग विशेष: अपने अस्तित्व से जुड़ने का एक मार्ग है ‘क्रिया-योग’

योग विशेष: अपने अस्तित्व से जुड़ने का एक मार्ग है ‘क्रिया-योग’

नई दिल्ली: पतंजलि के योग सूत्र में क्रिया-योग का कई बार उल्लेख है। यह साधना की एक प्रक्रिया है। इसका एक आयाम जीवन जीने की कला से सीधे संबंधित है। किसी मनुष्य का मन निष्काम भाव में आ जाए तो क्रिया-योग के एक आयाम से वह अपने आप जुड़ जाता है।

इसे समझने के लिए गीता के दूसरे अध्याय का 40वां श्लोक बहुत सहायक है। उसे इस तरह पढ़ सकते हैं- ‘निष्काम कर्म योग में बीज का नाश नहीं होता है। इसलिए इस निष्काम कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा अभ्यास जन्म-मृत्यु रूप महान भय से उद्धार कर देता है।’ यह तो थोड़ी ऊंची बात है। साधारण शब्दों में कह सकते हैं कि बिना अपेक्षा के जो व्यक्ति अपना काम करते हैं वे निष्काम भाव वाले होते हैं।

इसके उलट सकाम बुद्धि होती है, जो हमेशा लाभ का विचार करती है। जहां निष्काम के विफल होने का सवाल नहीं है। वहीं सकाम में सफलता की मंजिल कभी नहीं मिलती। क्योंकि सकाम व्यक्ति में हमेशा तृष्णा होती है, तो निष्काम भाव में तृप्ति का सुख होता है। क्रिया-योग तृप्ति की साधना है। इसे ही मनुष्य अपने में उतार सके, इसके लिए श्वास की कुछ क्रियाएं इस पद्धति में निर्धारित की गई हैं।

अपने अस्तित्व से जुड़ने का एक मार्ग क्रिया-योग है। जिस तरह एक वृक्ष पृथ्वी से अपनी बहुत सी जड़ों से जुड़ा होता है, उसी तरह मनुष्य के लिए भी अस्तित्व से जुड़ने के लिए उसके शरीर में ही कई माध्यम हैं। क्रिया-योग में ‘कूटस्थ’ शब्द मूल है। उसी में यह योग का सूत्र समाया हुआ है। इसे लाहिड़ी महाशय के वंशज सत्यचरण लाहिड़ी ने उनके जीवन के जरिए समझाया है।

जब उन्होंने देखा कि क्रिया-योग के बारे में बहुत भ्रम फैल रहा है तो 1984 में जीवनी लिखवाई। क्रिया-योग को समझाने के लिए लाहिड़ी महाशय की डायरियों को आधार बनाया। अपनी एक डायरी में लाहिड़ी महाशय ने ‘कूटस्थ’ के संबंध में इस तरह लिखा है- ‘भूलो ना, भूलो ना तारे, से घन सृष्टि संहारे, सर्वदा आछे सम्मुखे देखोना-देखोना तारे। सदा स्मरण कर ओंकारेर तारे।’

अर्थात ‘कूटस्थ वही है जो सृष्टि से संहार तक सभी अवस्थाओं में ही घन कृष्णवर्ण के रूप में वर्तमान है, उसे कभी मत भुलाओ। वह हमेशा सबके सामने है उसे भर आंख देखो और ओंकार जप-क्रिया के माध्यम से नित्य स्मरण करो।’

इसके लिए व्यक्ति को अपनी देह में प्रवेश करने की विधि चाहिए। जो किसी गुरु से उपलब्ध हो जाए तो सबसे अच्छा। नहीं तो स्वयं की आती-जाती श्वास को देखने का अभ्यास कर यह जाना जा सकता है कि अपने शरीर में ऊर्जा का केंद्र कहां है।

क्रिया-योग में कर्म की प्रधानता है। हर व्यक्ति के शरीर में कर्म का ऊर्जा केंद्र आज्ञाचक्र में होता है। वह माथे के बीच में है। वह संकल्प का भी केंद्र है। उस पर ध्यान केंद्रित करें तो संकल्प की गति शुरू हो जाती है। यह पुरुष के लिए है, लेकिन स्त्री के लिए यह केंद्र है हृदय। क्रिया-योग के अभ्यास से किसी भी व्यक्ति को अपनी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं में संतुलन बनाना सरल होता है। ब्लड प्रेशर की भांति उसका ‘ब्रेथ-प्रेशर’ भी संतुलित रहता है।

क्रिया-योग की परंपरा में उनके वंशज शिवेंदु लाहिड़ी इस समय हैं। जो ज्यादातर विदेश में रहते हैं। कुछ अवसरों पर भारत में रहते हैं। इनकी उम्र 77 साल है। इस परंपरा में संस्था का निर्माण नहीं हुआ है। यह संतान परंपरा है। शिवेंदु लाहिड़ी क्रम में चौथे हैं। बनारस के चैशट्टी घाट स्थित ‘सत्यलोक’ को इस परंपरा के क्रिया साधक तीर्थ मानते हैं। वही लाहिड़ी महाशय की कर्म स्थली रही। उन्होंने 1895 में शरीर छोड़ा। उससे पहले 15 साल वहीं रहे।

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