आसमान में लड़ रहे है पेंच, पतंगबाज़ी की धूम

(सुरभित दत्त)

छपरा: पतंगबाज़ी का क्रेज इन दिनों युवाओं और बच्चों में देखा जा रहा है. हर साल सर्दियों के शुरुआत से ही बच्चों में पतंबाज़ी का खुमार चढ़ जाता है. शहर के लगभग हर घर के छतों पर युवा पतंगबाज़ी करते दिखते हैं.

वाह क्या काटा है!, जैसे बोल बच्चों से सुनाई पड़ने लगते है. आसमान में पेंच लड़ती है और सफलता मिलने पर इस वाक्य को लड़के जोर से चिल्लाते है. आपने भी जरुर सुना होगा.

पतंगबाज़ी का यह सिलसिला सूर्य के उत्तरायण यानि मकर संक्रांति (खिचड़ी) तक चलता है. पतंग उड़ाने के लिए ज़रूरी मांझा, पतंग और लटाई की इन दिनों बाज़ारों में मांग है. बैन के बाद चाईंनीज़ धागे की जगह भारतीय धागों ने  ले ली है. वहीं धागे, लटाई और पतंग की खरीदारी के लिए युवा दुकानों पर पहुँच रहे हैं.

वर्षों से पतंगों का काम करते आ रहे मुन्ना बाताते हैं कि आधुनिक होती दुनिया के साथ- साथ जब मनोरंजन के कई साधन आ गए हैं. पतंगबाज़ी से जुड़े पारंपरिक व्यवसाय इसके प्रभाव में आ गये हैं. पहले की तुलना में व्यवसाय में काफी गिरवाट आ गई है. जिस से पतंग बनाने वाले के रोज़ी रोजगार पर असर पड़ा है.

वही भगवान बाजार में पतंग, लटाई और धागे की दूकान चला रहे आकाश कुमार ने बताया कि पतंगों की खरीदारी के लिए युवा उनकी दुकान पर पहुँच रहे है. हालाकि पहले की तुलना में कम लोग पतंगबाजी कर रहे है. आकाश ने बताया कि अब केवल मकर संक्रांति के दिन जमकर पतंगबाजी होती है. आम दिनों में एक्का दुक्का लोग ही पतंग खरीदने पहुंचते है.

2 रुपये से लेकर 15 रुपये तक के पतंग

पतंगबाजी के शौक के लिए पतंगों की खरीदारी करने पहुँच रहे युवाओं को महंगाई की मार झेलनी पड़ रही है. इस साल पतंगों के दामों में इजाफा हुआ है. पतंग 2 रुपये से लेकर 15 रुपये तक की बिक रही है. कुछ खास बड़े साइज़ के पतंगों के दाम उनके साइज़ के अनुसार ज्यादा भी है.

चाइनीज धागों की जगह भारतीय धागों की बिक्री

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पतंगबाजी का नाम आते ही पिछले कुछ दिनों से चाइनीज धागों का जिक्र होने लगता है. भारत में इन धागों पर लगे प्रतिबंध के बाद अब बाजारों में चाइनीज टाइप भारतीय धागे दिख रहे है. ये धागे दिखने में चाइनीज धागों के जैसे ही है पर इनका निर्माण भारत में हुआ है.

लकड़ी की जगह प्लास्टिक की लटाई

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पतंगबाजी के लिए लटाई भी जरुरी घटक है. ऐसे में बाज़ार में पहले बिकने वाली लकड़ी की लटाई की जगह अब प्लास्टिक की लटाई ने ले ली है. हालाकि लकड़ी के लटाई आज भी पतंगबाजों की पहली पसंद है. पर नए उत्साही बच्चे प्लास्टिक की लटाई से पतंगबाजी का मज़ा ले रहे है. प्लास्टिक की लटाई लकड़ी की लटाई की तुलना में सस्ती बिक रही है.

छपरा शहर में लोग पहले खूब पतंबाज़ी करते थे. आलम यह रहता था कि आकाश में केवल पतंग ही पतंग दिखाई पड़ते थे पर अब समय बदला है और उसके साथ साथ लोगों के मनोरंजन के साधन भी बदल गए हैं.

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