कर्त्तव्य से बनता है देश

कर्त्तव्य से बनता है देश

(प्रशांत सिन्हा) हम अक्सर शिकायत करते हैं कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों के बाद भी हमें देश ने कुछ नही दिया। यदि सभी लोग याचना छोड़कर देश के प्रति अपने कर्त्तव्य निभाएं तो देश की उन्नति को कोई नहीं रोक सकता।
अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति जे एफ कैनेडी ने कहा था ” यह मत सोचो कि देश आपको क्या दिया है बल्कि यह सोचो कि आपने देश को क्या दिया है “। बात नारों की नही है बल्कि विचारो की है। विचार यह है को क्या मैं देश के सामने याचक बन कर आता हूं या देश के लिए कुछ करने की इच्छा करने की इच्छा से जीता हूं?

आमतौर पर हम देश से अपेक्षाएं रखते है, स्वतंत्रता से अपेक्षाएं रखते है लेकिन खुद से कोई अपेक्षा नहीं रखते। यह जानते हुए भी की हमसे ही बनता है देश। हम भारत के लोग अधिकारों को लेकर बहुत सर्तक सजग और चौकस है । संविधान प्रद्दत मौलिक अधिकारो की बात आते ही हमारा लहजा शिकायती हो जाता है ।सही मूंह और मूड को बुरा सा बनाकर सरकारों और संवैधानिक,संस्थाओं पर तोहमत लगाने लगते है । हमें यह नहीं मिल रहा है हमें वह हासिल नहीं है। हमें उसकी आज़ादी चाहिए हमें इसकी आज़ादी चाहिए।

जिस संविधान ने हमे मौलिक अधिकारों को उपहार के रूप में नवाजा है। उसी ने कर्तव्यों के दायित्व बोध की टोकरी का बोझ भी सर पर लाद दिया है। कर्तव्यों की बात आते ही औसत भारतीय किंकर्तव्य विमुढ हो जाते हैं,बगले झांकने लगते हैं या कोई कुतर्क करने लगते हैं। यदि हम उन लोगों की बात को सही भी मान लें की देश गर्त में जा रहा है, तो क्या उसके जिम्मेदार हम नही हैं ? हम देश के लिए कुछ नही करते, उसकी आर्थिक, सांस्कृतिक समृद्धि में कोई योगदान नहीं करते पर देश से अपेक्षा करते रहते हैं की वह हमारे लिए कुछ करे। सिर्फ टैक्स दे कर हम यह समझने लगते हैं कि हमने अपना कर्त्तव्य कर लिया जो गलत है। हमसे ही देश बनता है। हमारे कार्यों से ही वह प्रगति के रास्ते पर जाएगा।

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हमलोगों में देश के प्रति देशभक्ति उजागर होने लगती है। रेडियो, टीवी में देशभक्ति के गाने हमे कुछ समय के लिए अपने कर्तव्यों के लिए प्रोत्साहित करते हैं। परंतु कुछ समय बाद हमारा मन भी और चीजों में उलझ जाता है। परिवार, समाज और ईश्वर तक तो ये बात हमे शायद समझ में आ जाय, परंतु जब देश की बात होती है तो हम सब लोगो में अधिकतर लूटने, हड़पने, छीनने का विचार आ जाता है। हम अपने काम से दूसरे शहर जाते हैं तो एक एक पैसा संभाल के खर्च करते हैं, परंतु कभी सरकारी खर्च पर कहीं जाने का अवसर मिल गया तो अनाप शनाप खर्च करने लगते हैं। आम तौर पर लोग कहते हैं की “सब चोरी करते हैं तो हम क्यों न करें ? ” यह तो वही बात हो गई की सब कुएं में कूद रहे हैं तो हम क्यों न कूदें ?

देशभक्ति का भाव किसी अवसर को मोहताज नहीं होता, वह हमारे भीतर का स्थाई भाव होना चाहिए। देशभक्ति का मतलब देश से अपेक्षा करना नही, बल्कि देश के लिए कुछ करने की प्रवृति पैदा होना है।

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