चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही नववर्ष का पहला दिन

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही नववर्ष का पहला दिन

सियाराम पांडेय ‘शांत’
यूं तो हम 1 जनवरी से नया साल मानते हैं लेकिन हिंदू नववर्ष यानी विक्रम संवत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है। इसबार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 13 अप्रैल को पड़ रही है। ब्रह्म पुराण में वर्णित है कि ब्रह्मा जी ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि रचना आरंभ की थी। सतयुग का प्रारम्भ इसी तिथि से हुआ था। सृष्टि का कालचक्र इसी दिन से शुरू हुआ था इसीलिए इसे सृष्टि का प्रथम दिन माना जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। धर्मराज युधिष्ठिर इसी दिन राजा बने थे और उन्होंने युगाब्द (युधिष्ठिर संवत) का आरंभ इसी तिथि से किया था। मां दुर्गा की उपासना का पर्व चैत्र नवरात्र भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही प्रारंभ होता है। उज्जयिनी नरेश सम्राट विक्रमादित्य ने भी विक्रम संवत् का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही किया था। महर्षि दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना भी इसी दिन की थी। इस नाते भी हम भारतीयों का नया साल चैत्र प्रतिपदा से ही शुरू होता है न कि एक जनवरी से।

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार 13 अप्रैल 2021 को विक्रम संवत 2078 और नवरात्र का शुभारंभ हो रहा है। साल में जिस तरह 12 मास होते हैं, उसी तरह 60 संवत्सर होते हैं। आंग्ल पंचांग में केवल सन बदलते हैं। वहां अधिमास नहीं होता लेकिन हिंदू पंचांग में हर वर्ष के अलग-अलग नाम और प्रभाव होते हैं। उनका अपना अधिपति देवता भी होता है। उसमें अधिमास भी होता है। 60 संवत्सरों के नाम प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृषप्रजा, चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, अव्यय, सर्वजीत, सर्वधारी, विरोधी, विकृति, खर, नंदन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्बी, विलम्बी, विकारी, शार्वरी, प्लव, शुभकृत, शोभकृत, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्ल्वंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत, परिधावी, प्रमादी, आनंद, राक्षस, नल, पिंगल, काल, सिद्धार्थ, रौद्रि, दुर्मति, दुन्दुभी, रूधिरोद्गारी, रक्ताक्षी, क्रोधन और अक्षय बताए गए हैं।

वर्तमान में प्रमादी नामक संवत्सर चल रहा है। आंग्ल वर्ष 2021 के मान से 13 अप्रैल को विक्रम संवत 2078 से आनन्द नाम का संवत्सर शुरू होगा। इस संवत्सर में जनता में खुशहाली होगी। इस संवत के राजा, मंत्री और वर्षा के अधिपति मंगल हैं। मंगल दंगल भी कराते हैं और मंगल भी करते हैं। इस संवत की ग्रह परिषद में छह पद क्रूर ग्रहों और 4 पद सौम्य ग्रहों के पास हैं। अमावस्या और नव संवत्सर के दिन सूर्य और चंद्रमा मीन राशि में एक ही अंश पर होना ज्योतिषीय लिहाज से पूरी दुनिया के लिए बेहद सुखद संयोग है। मंगल युद्ध और विद्रोह के देवता हैं। हिंसा, दुर्घटना, भूकंप, उपद्रव, सामाजिक और राजैनतिक अस्थिरता के कारक ग्रह हैं। ऐसे में इस साल आंधी-तूफान का भी जोर रहेगा। मंगल अग्नि और बल के प्रतीक हैं। माना जा सकता है कि नव संवत्सर दुनिया में नवोत्साह और नव ऊर्जा भरेगा। अवरोध आएंगे लेकिन प्रभावहीन रहेंगे।

नव संवत्सर का नाम इसबार राक्षस बताया गया है। ऐसे में इस वर्ष तामस प्रवृत्तियों की अधिकता देखने को मिल सकती है। तकरीबन 90 वर्ष बाद ऐसा संयोग बन रहा है, जब संवत 2078 राक्षस नाम से जाना जाएगा जबकि संवत्सर के क्रमानुसार नाम की गणना में प्रमादी संवत्सर के बाद आनंद और उसके बाद राक्षस संवत्सर आता है। निर्णय सिंधु के मुताबिक, 89 वर्ष का प्रमादी संवत्सर अपना पूरा वर्ष व्यतीत नहीं कर रहा। इस कारण 90 वें वर्ष में पड़ने वाला संवत्सर विलुप्त नाम वाला होगा। उसके नाम आनंद का उच्चारण नहीं किया जाएगा। इस निर्णय के अनुसार वर्तमान प्रमादी संवत 2077 फाल्गुन मास तक रहेगा जो 28 फरवरी 2021 से लेकर 28 मार्च 2021 तक रहेगा। इसके आनंद नाम का विलुप्त संवत्सर पूर्ण वत्सरी अमावस्या तक रहेगा जबकि आगामी संवत्सर संवत 2078 जो राक्षस नाम का होगा वह चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होगा।

शास्त्रों में हर ऋतु चक्र को वत्स कहा गया है। सूर्य को इनका पिता माना गया है। इसी वत्स से वत्सर या संवत्सर नाम पड़ा है। सूर्य के संबंध से संवत्सर, बृहस्पति के संबंध से परिवत्सर एवं सावन के संबंध से ईडा वत्सर, चंद्र के संबंध से अनुवत्सर, नक्षत्र के संबंध से वत्सर कहा गया है। अधिकतर संवत्सरों को उसके प्रवर्तकों द्वारा अपनी उपलब्धियों को प्रकाश की तरह श्रेष्ठ दिखाने के लिए शुक्ल प्रतिपदा को प्रारंभ किया गया।
इसमें शक नहीं कि पश्चिमी देश लंबे समय तक सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक संवत्सर का निर्माण नहीं कर सके। इसकी वजह लंबे समय तक उन्हें संख्या का ज्ञान न होना भी हो सकता है। भारतीय नववर्ष हमेशा 12 माह का रहा। चांद्रमास के नाम चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ तथा फाल्गुन बताए गए हैं। वैदिक युग में इसे मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभ, नमस्य, इष, ऊर्ज, सह, सहस्य, तप और तपस्या के नाम से जाना जाता था। यह सभी माह ऋतु आधारित थे। यह भी सच है कि नक्षत्र हमारे आकाश मंडल के मील के पत्थरों की तरह हैं जिससे आकाश की व्यापकता का पता चलता है। वैसे नक्षत्र तो 88 हैं किंतु चंद्र पथ पर 27 ही माने गए हैं। चंद्रमा अश्‍विनी से लेकर रेवती तक के नक्षत्र में विचरण करता है, वह काल नक्षत्रमास कहलाता है। यह लगभग 27 दिनों का होता है इसीलिए 27 दिनों का एक नक्षत्रमास कहलाता है।

भारतीय संवत्सर पूरी तरह प्रकृति और विज्ञान पर आधारित है लेकिन पाश्चात्य जगत में प्रकृति और विज्ञान दोनों को किनारे रख दिया गया है। पाश्चात्य जगत में पहले 10 महीने का ही वर्ष होता था। प्रारंभ में उनका वर्ष 304 दिन का ही होता था। 48 ई. में इसे बढ़ाकर 355 दिन का कर दिया गया। राजा इंपोरियम ने वर्ष के महीनों को 10 से बढ़ाकर 12 माह किया और इसमें जनवरी और फरवरी दो नए महीने जोड़े। राजा जूलियस सीजर ने पूर्व में प्रचलित ‘पेटेंबर’ महीने को अपने नाम पर ‘जुलाई’ कर दिया और पहले के शासकों से अपने को बड़ा दिखाने के लिए 31 दिन का महीना निर्धारित किया। रोम के शासक आगस्टक का जन्म छठे मास में हुआ था। इसीलिए पूर्व के महीने ‘हैक्सेंबर’ को अपने नाम पर ‘अगस्त’ कर दिया। 1582 ई. में रोम के पोप ग्रेगरी अष्टम ने पुन: रोम कैलेंडर में सुधार किया। उनसे पहले यहां नववर्ष 25 मार्च को मनाया जाता था। पोप ने 25 मार्च के स्थान पर 1 जनवरी को पहला दिन घोषित किया, जिसका विश्वभर में प्रबल विरोध हुआ। इंग्लैंड तथा अमेरिका के उपनिवेशों में सन 1732 तक नववर्ष 25 मार्च को ही प्रारंभ होता था। ग्रेगेरियन कैलेंडर में दसवां मास दिसंबर अब बारहवां मास बन गया।
भारत में इसे दो प्रकार का माना गया- एक, धरती द्वारा सूर्य की परिक्रमा के आधार पर सौर वर्ष और दूसरा, चंद्रमा द्वारा धरती की 12 परिक्रमा पूर्ण करने के आधार पर चांद्र वर्ष। रोम में पूर्व में चांद्र वर्ष मनाया जाता रहा है। अरब में अब भी चांद्र वर्ष ही चलता है। जबकि पाश्चात्य देशों में सौर वर्ष का प्रचलन है। नवंबर, 1952 में भारत में गठित ‘पंचांग सुधार समिति’ ने 1955 में सौंपी अपनी रपट में विक्रमी संवत् को भी स्वीकार करने की सिफारिश की थी, किंतु तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के आग्रह पर ग्रेगेरियन कैलेंडर को ही राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में स्वीकार किया गया। ग्रेगेरियन कैलेंडर की कालगणना मात्र 2 हजार वर्ष प्राचीन है, जबकि यूनान की कालगणना 1,582 वर्ष, रोम की 2,757 वर्ष, यहूदी 5,768, मिस्र की 28,691, पारसी 1,98,875 तथा चीन की 9,60,02,305 वर्ष पुरानी है। भारतीय कालगणना की बात करें तो ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 110 वर्ष है जिसके व्यापक प्रमाण उपलब्ध हैं। इस लिहाज से भारतीय काल गणना सबसे पुरानी, वैज्ञानिक और ग्रह-नक्षत्रों की चाल पर आधारित है।

भारतीय विक्रम संवत् प्रकृति में बदलाव, जीवन में नूतनता, शौर्य और विजय का अहसास कराता है। 372 ई. में यह संवत् कृतनाम से जाना जाता था। गुजरात प्रांत को छोड़कर पूरे भारत में यह संवत् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चलता है। चैत्र शुक्ल पक्ष आरंभ होने के पूर्व ही प्रकृति नववर्ष के आगमन का संदेश देने लगती है। प्रकृति की पुकार, दस्तक, गंध, दर्शन आदि को देखने, सुनने, समझने का प्रयास करें तो हमें लगेगा कि प्रकृति कह रही है कि पुरातन का समापन हो रहा है और नवीन बदलाव आ रहा है।
भारतीय मनीषियों ने इस वैज्ञानिक एवं कालजयी ज्ञान-विज्ञान को लंबे अनुसंधान एवं प्राप्त परिणामों के आधार पर विकसित किया था। लेकिन नई पीढ़ी को अपनी इस श्रेष्ठ परंपरा का ज्ञान ही नहीं है। इसलिए आवश्यक है कि नववर्ष का पहला दिन पूरे भारत में चैत्र शुल्क प्रतिपदा को ही माना जाए और इसी हिसाब से सरकारी कामकाज भी निर्धारित हों। भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए लंबा समय बीत चुका है। इसके बाद भी हम कबतक गुलामी का दस्तावेजी पंचांग अपने माथे पर लादे फिरेंगे।

(लेखक समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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