महानायक याद रहे, पर लोकनायक को भूल गए

महानायक याद रहे, पर लोकनायक को भूल गए

नीरज सोनी  

अकेला चना क्या भाड़ फोड सकता है? यह सवाल हमेशा दिमाग में उठता है जब हम सरकारी तंत्र की मार खाते हैं. लेकिन लोकतंत्र में ऐसे कई चने हुए जिन्होंने अकेले ही घड़े रूपी सरकार को तोड़ दिया. जयप्रकाश नारायण एक ऐसे ही शख्स थे जिन्होंने अपनी जिंदगी देश के नाम कर दी और अकेले दम पर तत्कालीन इंदिरा गाँधी की सरकार को दिन में तारे दिखला दिए.

देश में समाजवादी आंदोलन में अहम भूमिका निभाने और लोकतंत्र को दोबारा जिंदा करने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण की कल 118 वीं जयंती है। उनके निधन को 43 बरस बीत चुके हैं, लेकिन आज तक उनके व्यक्तित्व का सही तरीके से यह आकलन नहीं हो पाया है कि उनकी मूल राजनीतिक विचारधारा क्या थी, वह देश में किस तरह की राजनीतिक प्रणाली चाहते थे? किसी भी तरह का चुनाव लड़े बिना आखिर वह किस लोकशाही की बात करते थे?

भारत रत्न लोकनायक जयप्रकाश नारायण छात्र जीवन से ही महात्मा गांधी की विचाराधारा से प्रभावित थे और 18 वर्ष की उम्र में असहयोग आंदोलन में शरीक हो गए थे, जयप्रकाश नारायण का नाम जब भी जुबां पर आता है तो यादों में रामलीला मैदान की वह तस्वीर उभरती है जब पुलिस जयप्रकाश को पकड़ कर ले जाती है और वह हाथ ऊपर उठाकर लोगों को क्रांति आगे बढ़ाए रखने की अपील करते हैं. जयप्रकाश नारायण ही वह शख्स थे जिनको गुरू मानकर आज के अधिकतर नेताओं ने मुख्यमंत्री पद तक की यात्रा की है. लालू यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, राम विलास पासवान, जार्ज फर्नांडिस, सुशील कुमार मोदी जैसे तमाम नेता कभी जयप्रकाश नारायण के चेले माने जाते थे लेकिन सत्ता के लोभ ने उन्हें जयप्रकाश नारायण की विचारधारा से बिलकुल अलग कर दिया.

निःसंदेह जयप्रकाश नारायण जैसे सपूतों को पाकर भारत माँ ने अपनी कोख की अवश्य सराहना की होगी. मानवता के मूल्यों को और स्वयं मानवता को अन्धकार से निकालकर प्रकाश में लाने के लिए जयप्रकाश जी ने जीवन भर संघर्ष किया, जूझे पर झुके नहीं पथ से मुड़े नहीं. मातृभूमि का कण- कण बोल उठा जयप्रकाश शतायु हो जनवरी 1921 ई. में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में पटना में एक विशाल सभा हुई उनके भाषण का जयप्रकाश जी पर बहुत गहरा असर पड़ा. उन्होंने दूसरे दिन ही कॉलेज छोड़ दिया, और अपने ससुर जी की सलाह पर राजेन्द्र बाबू की निगरानी में सदाकत आश्रम में चल रहे विद्यापीठ में चले गए. इंटर का इम्तिहान दिया और ऊँचे नम्बरों से इंटर पास किया. बम्बई में अक्टूबर 1934 ई. को कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी को बकायदा कायम किया गया. जयप्रकाश जी उस नई पार्टी के जनरल सेक्रेटरी नियुक्त किये गए. 7 मार्च 1940 ई. की शाम को जयप्रकाश नारायण जी गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस उन्हें जमशेदपुर जेल ले गयी और वहाँ उन्हें चाईवास जेल में बंद कर दिया गया. ‘‘ भारत छोड़ो आन्दोलन’’ के दौरान जयप्रकाश जी हजारीबाग़ जेल में बंद थे. इस जनक्रांति के आन्दोलन में भाग लेने के लिए उनकी आत्मा छटपटा रही थी. उन्होंने जेल से भागने का निश्चय किया. 6 नवम्बर 1942 को दिवाली के अवसर पर जेल के सभी कर्मचारियों और कैदियों के लिए दावत और नाच गाने के कार्यक्रम का आयोजन किया गया. राम वृक्ष बेनीपुरी जी इस कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे.

उसी समय जयप्रकाश जी जान की बाज़ी लगाकर नई धोती की रस्सी बनाकर छः मिनट में जेल की दीवार लांघ गए और बाहर निकल गए. बारह घंटे तक रामवृक्ष बेनीपुरी जी ने जयप्रकाश जी बीमारी का बहाना कर के किसी को पता नहीं चलने दिया कि वे जेल से भाग गए है. ब्रिटिश सरकार ने जयप्रकाश जी को जिन्दा या मुर्दा पकड़वाने के लिए दस हजार का ईनाम रखवाया.

उन्होंने नेपाल में आज़ाद दस्ते का गठन किया.1943 ई. में उन्हें एक बार फिर चलती ट्रेन से उन्हें और डॉ. लोहिया को गिरफ्तार कर लिया गया. गांधी जी ने यह साफ़ कर दिया कि दोनों की रिहाई के बिना अंग्रेज सरकार से कोई भी समझौता संभव नहीं है इसके फलस्वरूप दोनों को 1946 ई. में रिहा कर दिया गया. 1954 ई. में उन्होंने गया और बिहार में विनोवा भावे के सर्वोदय आन्दोलन में जीवन समर्पण की घोषणा की .जयप्रकाश जी ने तत्कालीन लोकनीति के पक्ष में राजनीति छोड़ दिया.1960 ई. में वे पुनः राजनीति में आ गए. 1974 ई. में किसानों के बिहार आन्दोलन में उन्होंने सक्रीय भूमिका निभाई.

बिगडती तबियत के बावजूद उन्होंने तात्कालीन सरकार इंदिरा गाँधी के प्रशासनिक नीतियों के विरुद्ध और भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन किया. उनके नेतृत्व में गुजरात में पीपुल्स पार्टी ने चुनाव जीता. 1975 ई. में जब आपातकाल की घोषणा हुई तो आन्दोलन के दौरान वे 600 व्यक्तियों के साथ बंदी बना लिए गए. 7 महीने जेल में रहने के बाद तबियत खराब होने की वजह से उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया. उनका निधन 8 अक्टूबर 1979 ई. को ह्रदय रोग और मधुमेह के कारण हुआ.

उनके निधन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उनके सम्मान में सात दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की….

यह लेखक के निजी विचार है | लेखक नीरज सोनी  

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