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23 May 2017      

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{संतोष कुमार बंटी}

सूबे की शिक्षा व्यवस्था कहाँ और किस दिशा में जा रही है, यह किसी को पता नही हैं. प्राथमिक से लेकर उच्च प्राथमिक शिक्षा सिर्फ नाम के लिए ही रह गयी हैं.

देश और प्रदेश के विकास में महत्पूर्ण योगदान निभाने वाली शिक्षा व्यवस्था धीरे धीरे हासिये पर जा रही हैं. यही कारण है कि बिहार की प्रतिभा दूसरे राज्यों में जाकर पढाई कर रही है.

विगत दो वर्षों में बिहार के छात्रों के लिए रीढ़ की हड्डी कही जाने वाली बोर्ड की परीक्षा व्यवस्था ने पूरे देश में शर्मसार किया हैं.

पहले खुलेआम परीक्षा में नक़ल और फिर बिना परीक्षा में शामिल हुए स्टेट टॉपर बनने की घटना ने बिहार के उन होनहार छात्रों के गाल पर गहरा तमाचा मारा है जो वर्ष भर मेहनत करते है लेकिन परिणाम किसी और के हाथ में चला जाता है.

इस ख़ामी के बाद बोर्ड में व्यापक फेरबदल हुए उतार चढ़ाव के बाद एक बार फिर बोर्ड के सञ्चालन का जिम्मा स्वच्छ छवि और कड़क अधिकारी के हाथ सौपा गया. जिसका परिणाम देखने को भी मिला लेकिन अब लगता है कि एक बार फिर यह व्यवस्था बिगड़ने वाली हैं.

एक बार फिर मैट्रिक और इंटर की परीक्षाएं आयोजित हुई. अब मूल्याङ्कन की बारी है लेकिन शिक्षकों ने अपनी मांगों के कारण मूल्याङ्कन कार्य का बहिष्कार कर दिया है.

FIR की धमकी मिली लेकिन वे मूल्याङ्कन केंद्रों पर नही लौटें आख़िरकार DEO ने स्नातक योग्यताधारी प्रारंभिक विद्यालय यानि 1 से 8 तक के शिक्षकों से मैट्रिक और स्नातकोत्तर योग्यताधारी शिक्षकों से इंटर उत्तर पुस्तिका मूल्याङ्कन कराने का पत्र निर्गत कर दिया हैं.

एक बार फिर यह सोचने वाली बात है कि जो शिक्षक विगत कई वर्षों से 1 से 8 तक की कक्षाओं का संचालन करते आ रहे है वह मैट्रिक और इंटर की उत्तर पुस्तिका कैसे जांचेंगे.

बहरहाल इस विषय पर एक बार फिर सरकार को सोचने की जरुरत है जिससे यहाँ के छात्रों का भविष्य उज्जवल हो सकें.

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